
मोबाइल फोन के जाल में फंसा बचपन, खेल से दूर हुए बच्चे
धौलपुर. कोरोनाकाल में ऑनलाइन पढ़ाई के कारण बच्चों ने मोबाइल फोन का खूब उपयोग किया। पढ़ाई के अलावा भी बच्चों की मोबाइल फोन देखने की प्रवृत्ति बढ़ गई। अब जब ऑफलाइन कक्षाएं शुरू हो गई तब भी बच्चों की मोबाइल फोन की लत नहीं छूट रही। इससे अभिभावक परेशान हैं। इन दिनों ज्यादातर घरों में माता-पिता इसका हल खोजने में जुटे हैं कि आखिर बच्चों को मोबाइल से कैसे दूर किया जाए। बच्चे मोबाइल फोन का इस्तेमाल बहुत ज्यादा करते हैं। ऑनलाइन पढ़ाई के कारण धौलपुर शहर में करीब 70 प्रतिशत बच्चों के पास खुद का मोबाइल फोन है। अब माता-पिता उनसे वापस मांगते हैं तो वे चिड़चिड़े हो रहे हैं। वहीं, चिकित्सकों का कहना है कि मोबाइल से निकलने वाली किरणों से कई बच्चों में नए रोग का जन्म हो रहा है। मोबाइल की लत इतनी बढ़ गई कि यदि किसी बच्चे के हाथ से मोबाइल छीन लिया जाता है तो वह आक्रामक तक हो जाता है।
यह हो रहा नुकसान
स्मार्टफोन से निकलने वाली नीली रोशनी से न सिर्फ सोने में दिक्कत आती है, बल्कि बार-बार नींद टूटती है। इसके ज्यादा प्रयोग से रेटिना को नुकसान होने का खतरा रहता है। मोबाइल से चिपके रहने से दिनचर्या अनियमित रहती है। इससे मोटापे और टाइप-2 डायबिटीज की आशंका बढ़ जाती है।
सरकार समाधान खोजे
मोबाइल की लत बड़ी समस्या है, इसलिए सरकार को इसका हल खोजने के लिए शोध कराना चाहिए। हर शहर या ब्लॉक स्तर पर स्वास्थ्य विभाग ऐसा केन्द्र भी स्थापित करे जहां मोबाइल से जुड़ी समस्याओं का उपाय बताया जा सके।
यह भी है कारण
कई माता-पिता भी मोबाइल पर या किसी कार्य में व्यस्त रहते हैं तो बच्चा उन्हें डिस्टर्ब नहीं करे इसलिए खुद ही उन्हें मोबाइल दे देते हैं। कोई बच्चा रोता है तो उसे चुप कराने के लिए मोबाइल देते हैं। उनके साथ कोई नहीं खेलता। ऐसे में बचपन मोबाइल के दुष्प्रभावों में फंस गया है।
बोले एक्सपर्ट
बच्चे पढ़ाई में मोबाइल, लैपटॉप का प्रयोग कर रहे हैं। कई बच्चे दिनभर मोबाइल पर लगे रहते हैं। इससे आंखों में ड्राइनेस की शिकायत बढ़ रही है। इससे आंखों में धुंधलापन और इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ता है। अस्पताल की सामान्य ओपीडी में १५ से २० प्रतिशत ऐसे मामले बढ़े हैं। बच्चों को मोबाइल के प्रयोग से दूर करना चाहिए। आंखों को धोते रहना चाहिए।
- डॉ. अशोक जिंदल, नेत्र रोग विभाग, सामान्य चिकित्सालय, धौलपुर
लगातार प्रयोग से बच्चों में मोबाइल की लत लग जाती है। इससे उनके ब्रेन में बदलाव आ जाता है। उसे डिसऑर्डर में शामिल किया गया है। मोबाइल के ज्यादा प्रयोग से उनमें बेचैनी, घबराहट, चिड़चिड़ापन, उदासी, खाना छोड़ देते, सामाजिक व पारिवारिक कटाव हो जाता है। ऐसे मामलों में दवा का कोई रोल नहीं होता है। ऐसे बच्चों की काउंसलिंग, बिहेवियर थेरेपी दी जाती है।
- डॉ. सुमित मित्तल, मनोचिकित्सक, सामान्य चिकित्सालय, धौलपुर
Published on:
24 May 2022 01:16 am
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