Dhanteras celebration: जानें क्यों खास है धनतेरस, यूं नाता है दिवाली से

धनतेरस का आयुर्वेद महत्व भी है। भगवान धन्वन्तरि का पूजन इसी दिन होता है।

By: raktim tiwari

Published: 13 Nov 2020, 10:40 AM IST

रक्तिम तिवारी/अजमेर.

कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस कहा जाता है। यह पर्व वास्तव में दिवाली के आगमन की सूचना देता है। इस दिन चांदी-नए बर्तन खरीदना सबसे शुभ माना जाता है। धनतेरस का आयुर्वेद महत्व भी है। भगवान धन्वन्तरि का पूजन इसी दिन होता है।

भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य का स्थान धन-ऐशवर्य से भी अधिक समझा जाता है। हम पहला सुख निरोगी काया की अवधारणा प्राचीन काल से सुनते आ रहे हैं। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कृष्ण त्रयोदशी पर भगवान धन्वन्तरि अपने हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वन्तरि को नारायण अर्थात विष्णु का अवतार भी माना जाता है। भारत सहित दुनिया को आयुर्वेद का परिचय भी
धन्वन्तरि ने ही कराया है।

यूं करें धनतेरस पर पूजन-खरीदददारी
धनतेरस पर किसी भी रूप में चांदी अथवा बर्तन खरीदना अति शुभ समझा जाता है।
धनसंपदा के देवता कुबेर कहलाते हैं। घर-प्रतिष्ठान में दीपदान करना चाहिए। कार्तिक मास की त्रयोदशी पर धनतेरस मनाई जाती है। लिहाजा यह दिवाली के आगमन की सूचना देती है। धनतेरस पर धन्वन्तरि और यमराज की पूजा का महत्व होता है।
घर-प्रतिष्ठान में आभूषण, रुपए और अन्य धनसम्पदा का विधि-विधान से पूजन करना चाहिए। अक्षत, रोली-मोली, गुड़, मिठाई और पुष्प चढ़ाकर भगवान धन्वन्तरि का आह्वान करना चाहिए। इससे धन-ऐश्वर्य बना रहता है।

यह है पौराणिक कथा
कार्तिक त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने पर भगवान विष्णु ने असुरों के गुरु शुक्राचार्य की आंख फोड़ दी थी। देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। वे बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए। शुक्राचार्य ने वामन रूप में भगवान विष्णु को पहचान लिया। उन्होंने बलि को कहा कि वामन कुछ भी मांगे तो इंकार कर देना। वे देवताओं की सहायता के लिए आए हैं।
बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी। वामन भगवान द्वारा मांगी गई तीन पग भूमि दान करने के लिए कमंडल से जल लेकर संकल्प करने लगा। बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य उसके कमंडल में सूक्ष्म रूप धारण कर बैठ गए। कमंडल से जल निकलना बंद हो गया। वामन रूपी नारायण इसे समझ गए। उन्होंने अपने हाथ में रखे कुशा को कमंडल पर ऐसा रखा जिससे शुक्राचार्य की आंख फूट गई। वह छटपटाते हुए कमंडल से निकल गए।

इसके बाद बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प लिया। तब भगवान वमान ने एक पैर में संपूर्ण पृथ्वी, दूसरे में अंतरिक्ष को नाप लिया। तीसरे पग के लिए कोई स्थान ना मिला तो बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया। इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति और उससे कई गुणा धन-संपदा मिल गई।

raktim tiwari Reporting
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