जापान से राजस्थान पहुंची एक अजीब बिमारी, ध्यान दें कहीं आपके बच्चे के दिल पे भी ना कर दे वार

जापान की बीमारी 'कावासाकी मासूम बच्चों के दिल पर वार कर रही है।

By: सोनम

Published: 04 Jan 2018, 08:45 PM IST

चन्द्रप्रकाश जोशी /अजमेर. जापान की बीमारी 'कावासाकी मासूम बच्चों के दिल पर वार कर रही है। सात समन्दर पार की इस बीमारी के मरीज अब भारत में भी सामने आ रहे हैं। अजमेर में भी एक मासूम बच्चे की कावासाकी बीमारी से पीडि़त के रूप में पहचान हुई। बाद में जेएलएन मेडिकल कॉलेज के संबद्ध अस्पताल के शिशु औषध विभाग में उपचार के बाद अब पीडि़त बच्चे के स्वास्थ्य में सुधार है। अगर समय पर क्लिनिकल डायग्नोसिस नहीं होता तो पीडि़त बच्चे के दिल पर यह बीमारी वार कर सकती थी।

 

कावासाकी बीमारी प्राय: 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में होती है। इस बीमारी में अभिभावक व आमजन को समय गंवाए चिकित्सक से परामर्श लेना आवश्यक है। कई बार बोदरी या अन्य बीमारी समझ कर उपचार में ढिलाई बरतना भारी पड़ सकता है। चिकित्सकों के अनुसार इस बीमारी की पहचान जापान के चिकित्सक ने की थी इसीलिए इसका नाम कावासाकी रखा गया। भारत में तो लाखों में कोई एक बच्चे में यह बीमारी पाई जाती है।


बीमारी के लक्षण-

कम से कम पांच दिन तक बुखार रहना।

-आंखों में ललाई एवं सूजन।
-मुंह में भी ललाई, छाले व किनारे कटना।

-नाखून के चारों ओर सूजन व लाल होना।
-लसिका ग्रंथियां बढ़ जाना।

-शरीर पर गहरे लाल-लाल चकत्ते पडऩा।

बढ़ जाती है प्लेटलेट्स :

इस बीमारी में डेंगू के विपरीत प्लेटीलेट्स की संख्या अधिक बढ़ जाती है। साथ ही वायरस इंफेक्शन हो जाता है।

कार्डिक अटैक की बढ़ जाती है संभावना :

समय पर क्लिनिकल डायग्नोसिस एवं उपचार शुरू नहीं होने पर यह बीमारी कार्डिक अटैक का कारण बन जाती है। कॉरोनरी हार्टरी फुलाव हो जाता है, क्लॉट बढऩे से हृदयघात हो सकता है।

यह बरतें सावधानी

समय पर बीमारी की पहचान एवं चिकित्सक से परामर्श एवं उपचार शुरू करवाना जरूरी है। अगर इसमें होती है तो लम्बे समय तक हार्ट के लिए खतरा हो सकता है।

 

कावासाकी बीमारी लाखों में एक-दो बच्चों में होती है। अजमेर में भी पीडि़त बच्चे का हाल ही उपचार किया है। उसके स्वास्थ्य में सुधार है। कावासाकी बीमारी पांच वर्ष या इससे कम आयु के बच्चों में ही होती है। इस बीमारी में क्लॉट बढऩे से हृदयाघात की भी संभावना रहती है। परिजन एवं चिकित्सक समय पर सावधानी बरतें एवं रैफरल एवं उपचार से बच्चों की जान बचाई जा सकती है।

-डॉ. बी.ए. कर्नावट, विभागाध्यक्ष शिशु औषध विभाग जेएलएन अस्पताल

सोनम Reporting
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