पशुओं के बूते किसानों के परिवार, उन्नत नस्ल-सुविधा-संरक्षण की दरकार

गीर नस्ल की गाय एवं मुर्रा नस्ल की भैंस पालन कर रहे हैं पशुपालक, जिले में ऊंट एवं अश्ववंश की कम तादाद, करीब ७ लाख लीटर दूध प्रतिदिन का उत्पादन जिले में

By: CP

Published: 15 Oct 2021, 02:25 AM IST

चन्द्र प्रकाश जोशी

अजमेर. पशुपालन व्यवसाय किसानों को आर्थिक रूप से समृद्ध करने का बहुत बड़ा जरिया है। कृषि एवं पशुपालन दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। पशुपालन अब व्यवसाय का रूप से लेता जा रहा है। कई किसान ऐसे हैं जिन्होंने समन्वित खेती के नवाचार के साथ-साथ पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए अन्य किसानों को प्रेरित किया। मगर अभी भी नस्ल सुधार एवं दुग्ध का उत्पादन बढ़ाने के लिए पशुपालकों को सुविधा, पशु संरक्षण की योजनाओं व जागरूकता की जरूरत है।
अजमेर जिले में करीब १० लाख से अधिक आबादी कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर है। इतनी बड़ी आबादी गाय, भैंस, बकरी, भेड़ सहित अन्य पशुओं का पालन भी कर रही है। जिले में पशुपालकों को और प्रशिक्षित करने के साथ उन्हें नस्ल सुधार कार्यक्रमों की गतिविधियों एवं विभागीय योजनाओं के बारे में और जागरूक करने की दरकार है।

यह है जिले में पशुओं की स्थिति

३.५० लाख गोवंश

३.४० लाख भैंस वंश

२००० उष्ट्रवंश

१५०० अश्ववंश

दूध का उतना उत्पादन

४.२५ लाख लीटर दूध (करीब) अजमेर डेयरी में सप्लाई।

३ लाख लीटर दूध अन्य डेयरी व घरेलू व्यवसाय में उपयोग।

इन नस्लों के पशुओं पर फोकस

अजमेर में गीर नस्ल की गायों के पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं मुर्रा नस्ल की भैंस पालन को पशुपालकों व किसानों को प्रेरित किया जा रहा है। इन दोनों ही नस्लों के सुधार के प्रयास जारी हैं।

कोरोना के बाद बढ़ी दूध की खपत

कोरोना संक्रमण के बाद दूध की खपत भी बढ़ी है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए दूध भी कारगर है। अजमेर डेयरी में भी दूध का उत्पादन बढ़ा है। दूध के अन्य उत्पाद भी तैयार हो रहे हैं।

खोया (फीका मावा) उत्पादन में आत्मनिर्भर बना अजमेर

अजमेर जिले के पशुपालकों की ओर से गांवों में फीका मावा (खोया) भी तैयार किया जा रहा है। इसमें अरांई, दादिया, तिहारी, मसूदा, झिपियां, भिनाय, पिलोदा, रेण, घणा, श्रीनगर सहित कई गांवों में मावे की भट्टियां पशुपालक/किसान ही चला रहे हैं। जहां प्रतिदिन करीब ५०० किग्रा तक फीका मावा तैयार हो रहा है।

उष्ट्रवंश व अश्व वंश का पालन कम

अजमेर जिले में ऊंट-ऊंटनी एवं घोड़े-घोडिय़ों की संख्या कम है। ऊंटों में बीमारी के कारण पशुपालकों का मोह कम हो रहा है। घोड़े-घोड़ी अभी भी लोग शौकिया पालते हैं। या फिर शादी-ब्याह में काम वाले इन्हें पालते हैं। जबकि भेड़-बकरियां तो ६ लाख से भी अधिक हैं।

पुरस्कार राशि बढ़ाई जाए

-कई कृषक अच्छी नस्ल की गायों का पालन कर रहे हैं। पशुपालन विभाग की ओर से पशु मेलों में अधिक दूध देने वाली, कद-काठी में अच्छी नस्ल की गायों को न्यून पुरस्कार राशि दी जाती है। गायों को लाने-ले जाने में ही इनाम की राशि का २० गुना पैसा खर्च हो जाता है। पशुपालन विभाग व सरकार इसे बढ़ाए।

पन्टू जोशी, गोपालक

CP Reporting
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