बाड़ी से निकल मुम्बई तक बज रही बांसुरी की धुन टेलेंट टॉक

जिले के बाड़ी निवासी राजीव गर्ग बांसुरी वादन में अपना लोहा मनवा रहे हैं। फिलहाल वे गंधर्व महाविद्यालय से संगीत में विशारद कर रहे हैं। उनके परिवार में वृद्ध माता पिता, चार भाई हैं।

By: Dilip

Published: 05 Apr 2021, 12:26 AM IST

धौलपुर. जिले के बाड़ी निवासी राजीव गर्ग बांसुरी वादन में अपना लोहा मनवा रहे हैं। फिलहाल वे गंधर्व महाविद्यालय से संगीत में विशारद कर रहे हैं। उनके परिवार में वृद्ध माता पिता, चार भाई हैं। गर्ग बताते हैं कि पढ़ाने लिखने में बाड़ी में ही हुई। उन्होंने बताया कि संगीतमय सफर की शुरुआत वर्ष 1995 में ही हो गई थी। वर्ष 1996 में हुए यूथ फेस्टिवल प्रतियोगिता में वे सांगैतिक वर्ग में पूरे राजस्थान में अव्वल आए।

तत्कालीन गवर्नर बलीराम भगत के हाथोंपुरस्कृत किया गया। लेकिन किन्हीं कारणों के वजह से बांसुरी की शिक्षा बाधित हो गई लेकिन एक बार फिर साल 2006 में बांसुरी की यात्रा एक नए सिरे से और एक नए उत्साह और अनोखे ख्वाब के साथ हुई थी कि, मैं भी किसी दिन पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी के जैसा ही बांसुरी बजा सकूंगा। देर ही सही, लेकिन एक ख्वाब देखा और उस ख्वाब ने मुझे अपने घर परिवार और भौतिक सुख सुविधाओं को त्याग करवा कर मुम्बई शहर पहुंचा दिया। वे जब वहां पहुंचे तो वाकई मुंबई उनकी कल्पनाओं से परे था।
शुरुआत की दिनों में वहां रहन-सहन में काफी परेशानी हुई। काम के लिए दर दर भटका। कुछ फिल्मों की सेट्स पर भी काम किया। इस बीच दूसरी तरफ वे पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के वृंदावन गुरुकुल के चक्कर बार बार काटता रहते। एक शुभ दिन उनके दर्शन हुए और फिर उस दिन से उनकी जि़न्दगी में बांसुरी के धुन बजने लगे। उनके वरिष्ठ शिष्यों में से एक हिमांशु नंदा ने शिष्य के रूप में स्वीकार किया।

फिर बांसुरी की पूर्ण रूपेण तालीम, गुरू-शिष्य परंपरा के अन्तर्गत उनसे ही हुई। करीब 8 साल उनकी शागिर्दी में रहा। सौभाग्यवश कई मंचों पर उनके साथ संगत करने का भी अवसर प्राप्त हुआ। वो 8 साल जीवन के चुनिंदा सबसे महत्वपूर्ण पलों में से एक है और हमेशा ही रहेंगे। वर्ष 2015 में स्वर साधना समिति मुम्बई की ओर से आयोजित अखिल भारतीय शास्त्रीय संगीत प्रतियोगिता में दूसरा स्थान प्राप्त किया। प्रतियोगिता ने मेरे मनोबल व आत्मविश्वास को काफी प्रोत्साहन मिला। सालों गुरुकुल जैसे माहौल में जिदंगी बिताने के बाद से इसी बांसुरी ने मुझे हिम्मत दी कि वे पुणे जैसे बड़े शहर में अकेला जाकर बस गए। वहीं से बांसुरी की नई सफर शुरू हुआ, जो कुछ भी मैंने अपने गुरु से सीखा, मैंने बांसुरी वादन के उन्हीं तरीकों को और सरल बनाकर नए युग के बच्चों को सिखानी शुरु की। घर घर जा कर बांसुरी की क्लासेज़ लेता, कॉरपोरेट शोज़ करता, छोटे-बड़े सभी स्टेज कार्यक्रमों का हिस्सा बना। यह सब किया, ताकि अपनी खुद की रोज़ी रोटी चला सकूं। ऊपरवाले की महरबानी से धीरे धीरे सब अच्छा होता चला गया। अज वे अपने देश और अन्य विदेशी छात्रों को भी ऑनलाइन व आफलाइन माध्यम से बांसुरी सीखा रहे हैं। जल्द ही पुणे शहर में एक संगीत अकादमी की स्थापना भी करने का विचार है। इस सरल सी दिखने वाली साज़ ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है और इसी बांसुरी ने मुझे सारी खुशियां दिलाई। मुम्बई और पुणे जैसे बड़े शहरों में अपनी अस्तित्व बनाने, संघर्ष करने और आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी। मैंने जीवनपर्यंत संगीत को ही अपना गुरू, और बांसुरी को ही अपना परिवार मान लिया है। आखरी सांस तक इसकी सेवा करने की ठान ली और बाकी सब अपने सारथी कृष्णा पर छोड़ दिया है।

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