अजमेर तक फैला ओखी का आतंक, गर्व से लहराते तिरंगे की शान में कुछ यूं आई कमी

ओखी तूफान भले ही गुजरात से आगे नहीं बढ़ा लेकिन इसने महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय को जरूर हिला दिया।

By: raktim tiwari

Published: 09 Dec 2017, 03:23 PM IST

अजमेर . ओखी तूफान भले ही गुजरात से आगे नहीं बढ़ा लेकिन इसने महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय को जरूर हिला दिया। विश्वविद्यालय ने ओखी तूफान से बिगड़े मौसम के चलते सौ फीट पर लहराते तिरंगे को उतरवा दिया। कायदे से ध्वज चढ़ाने और उतारने की पारम्परिक रस्म होती है, लेकिन प्रशासन ने इसकी पालना करना मुनासिब नहीं समझा।

 

मंगलवार और बुधवार को ओखी तूफान के चलते अजमेर में भी मौसम खराब रहा था। बादल छाने से मौसम काफी सर्द रहा। इधर मौसम के बिगड़े मिजाज ने महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय की धड़कनें बढ़ा दी। प्रशासन ने सौ फीट पर लहराते तिरंगे को फटने के डर से आनन-फानन में उतार लिया।
यह है ध्वज फहराने-उतारने की रस्मभारत में प्राचीन काल से ध्वज को फहराने और उतारने की रस्म निर्धारित है।

 

सतयुग और द्वापर युग से लेकर रियासतों के जमाने में सूर्योदय के साथ ध्वज फहराया जाता था। इस दौरान ढोल-नगाड़े, दुंदुभी या शहनाई बजाई जाती थी। इसी तरह सूर्यास्त होने से पूर्व ध्वज को इसी तरह सम्मानपूर्वक उतारा जाता था। आजादी से पहले 1921 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पहल पर कांग्रेस की बैठक में सबसे पहले ध्वज अपनाया गया। इस तिरंगे ध्वज के मध्य में चरखे का निशान रखा गया। स्वाधीनता के बाद तिरंगा देश का राष्ट्रीय ध्वज बना। इसके मध्य में अशोक चक्र को अपनाया गया।

परम्परा का नहीं किया पालन?

तिरंगे के सम्मान में भी पारम्परिक रस्में कायम है। अलबत्ता राष्ट्रीय ध्वज फहराते-उतारते वक्त राष्ट्रगान और सलामी बेहद जरूरी है। छात्रों की मानें तो विश्वविद्यालय ने तिरंगा उतारते वक्त परम्पराओं का पालन नहीं किया। ध्वज को दिन में बगैर सलामी और राष्ट्रगान के उतार दिया गया। बीते दो दिन से तिरंगा नहीं लहाराया गया है। मालूम हो मानव संसाधन विकास मंत्रालय और राजभवन के निर्देश पर विश्वविद्यालय ने बीती 7 नवम्बर को सौ फीट के पोल पर तिरंगा लगाया गया था।

raktim tiwari Reporting
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