MDSU: देखिए हिंदी की दुर्दशा, बंद डिपार्टमेंट में खाली मेज-कुर्सियां

19 विद्यार्थियों ने ऑनलाइन फॉर्म भरे। लेकिन किसी विद्यार्थी ने फीस जमा नहीं कराई। यह महज कोरोना का अशर नहीं बल्कि विभाग की पांच साल से दुर्दशा का प्रतीक है।

By: raktim tiwari

Published: 26 Dec 2020, 09:29 AM IST

रक्तिम तिवारी/अजमेर.

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की 'दुर्गति Ó हो रही है। इस साल 19 विद्यार्थियों ने ऑनलाइन फॉर्म भरे। दुर्भाग्य से किसी ने फीस जमा नहीं कराई। अब विभाग बगैर दाखिलों के चलेगा। अगले सत्र में भी सीटें भरेंगी या नहीं इसमें संशय है।

पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह के निर्देश पर महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में साल 2015 से हिंदी विभाग स्थापित किया गया था। पांच साल में विभाग अपनी पहचान कायम नहीं कर पाया है। यहां सिर्फ दिखाने के लिए कामचलाऊ शिक्षक कक्षाएं लेते रहे। विद्यार्थियों की संख्या भी 10-12 तक ही सिमटी रही।

इस बार नहीं कोई विद्यार्थी
हिंदी विभाग में 20 सीट स्वीकृत हैं। सत्र 2020-21 में दाखिले के लिए 19 विद्यार्थियों ने ऑनलाइन फॉर्म भरे। लेकिन किसी विद्यार्थी ने फीस जमा नहीं कराई। यह महज कोरोना का अशर नहीं बल्कि विभाग की पांच साल से दुर्दशा का प्रतीक है। स्थाई शिक्षक तक नहींना सरकार ना विश्वविद्यालय ने विभाग में स्थाई प्रोफेसर, रीडर अथवा लेक्चरर की नियुक्ति करना मुनासिब समझा है। विभाग की तरफ से कोई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, कार्यशाला, विद्यार्थियों की प्रतियोगिता नहीं होती है।

घट रहे हैं प्रवेश
विवि से सम्बद्ध कॉलेज में स्नातकोत्तर स्तर पर संचालित हिंदी कोर्स में दाखिले कम रहे हैं। अजमेर के सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय जैसे कुछेक संस्थाओं को छोड़कर अधिकांश में युवाओं का रुझान हिंदी में एमए करने की तरफ घट रहा है। शिक्षक, भाषा प्रयोगशाला और अन्य संसाधन नहीं होने से विद्यार्थियों की प्रवेश में रुचि कम हो रही है। तकनीकी और अन्य कॉलेज में अंग्रेजी भाषा विभाग में प्रवेश ज्यादा बढ़ रहे हैं। ऐसा तब है जबकि फेसबुक, वाट्सएप और कई वेबसाइट हिंदी में कामकाज कर रही हैं।

हिंदी से निकली कई बोलियां
हिंदी भाषा कई बोलियों की जनक मानी जाती है। इनमें मारवाड़ी, कनौजी, अवधी, बुंदेली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी और अन्य शामिल हैं। उर्दू और हिंदी भाषा में तो सदियों का संबंध हैं। इसके अलावा पड़ौसी मुल्क नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश में भी हिंदी बोली जाती है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन सहि कई देशों में स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी में हिंदी नियमित पढ़ाई जा रही है।


हिंदी विभाग में विद्यार्थियों के प्रवेश नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग को सशक्त बनाने की जरूरत है। इसमें व्याख्यान, काव्य गोष्ठी और अन्य कार्यक्रम नियमित होने चाहिए।
डॉ. एन.के. भाभड़ा, पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष जीसीए

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