आवारा जानवरों पर अंकुश के नाम पर लाखों खर्च

फिर भी हर पल लोगों की जान पर मंडरा रहा खतरा , नगरपालिका की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल

एक दशक से सांड और गायों के हमलों को झेल रहे राजाखेड़ा के लोगों को उम्मीद थी कि पिछले वर्ष नगरपालिका 5 लाख रुपये खर्च कर मुख्यालय सांड और गाय मुक्त हो जाएगा। यहां के निवासी बिना किसी डर के सडक़ों पर चल सकेंगे, लेकिन यह खुशफहमी टिक न सकी।

By: Dilip

Published: 20 Nov 2020, 12:57 AM IST

राजाखेड़ा. एक दशक से सांड और गायों के हमलों को झेल रहे राजाखेड़ा के लोगों को उम्मीद थी कि पिछले वर्ष नगरपालिका 5 लाख रुपये खर्च कर मुख्यालय सांड और गाय मुक्त हो जाएगा। यहां के निवासी बिना किसी डर के सडक़ों पर चल सकेंगे, लेकिन यह खुशफहमी टिक न सकी।
पालिका ने कागजों में ही 2000 सांड गाय शहर से कागजों में ही खदेड़ दिए गए, लेकिन इससे ज्यादा आज भी वहीं जस के तस दिन प्रतिदिन नागरिकों को घायल कर रहे हैं।

क्या है मामला
उपखंड मुख्यालय पर किसानों द्वारा खदेड़ी गई हजारों गायें, सडक़ों पर खुली विचरण कर रही हैं। जो भोजन कि तलाश में हिंसक होती जा रही है। सैकड़ों की संख्या में सांड-गाय तो मुख्य बाजार में विचरण करती रहती है, जो बाजार में सामान लेने आए लोगो के थैले झपटने के लिए नगरिकों पर ही हमला कर देती हैं। कई बार ये आपस मे ही विवाद कर देते हैं।

लोग इनकी हिंसक चपेट में आकर घायल हो जाते हैं। वार्ड 24 की बुजुर्ग महिला शीला देवी तो इनके हमलों में 2 बार गंभीर घायल होकर कई माह आगरा के निजी चिकित्सालयों के बिस्तरों पर 6 माह से अधिक समय गुजार कर बमुश्किल ही बच पाई है। उनके पुत्र प्रदीप का कहना है कि नगरपालिका के कथित भ्रष्टाचार के चलते लोगों की जान पर बन आ रही है, लेकिन यहां भी लोग कमाई के रास्ते ही तलाश रहे हैं।
इसी सप्ताह बाइक सवार रोहाई निवासी किशना कुशवाह भी सांडों की लड़ाई की चपेट में आकर अपने शरीर की दर्जनों हड्डियों को तुड़वा चुके है। 2000 गाय बाहर भिजवाई तो फिर इतनी ही कहां से आईसारे प्रकरण में मिलीभगत का बड़ा खेल सामने आ रहा है। विधायक के निर्देश पर नगरपालिका ने 250 रुपए प्रति गाय पकडऩे के लिए ठेका देकर कुछ ही दिनों में 2000 गाय और सांड पकड़वा कर ठेकेदार को भुगतान भी कर दिया। नगरपालिका क्षेत्र राजाखेड़ा को गाय सांड मुक्त बना दिया। लेकिन हालात जस के तस है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि वापस हजारों की तादाद में ये पशु तुरंत ही शहर में कहां से आ गए।

व्यापारी नेता लक्ष्मीकांत गुप्ता ने आरोप लगते हुए बताया कि सारे कार्य कागजों में ही संपादित हो रहे है। नहीं है कांजी हाउसगौरतलब है कि नगरपालिका के पास डेढ़ दशक पूर्व कांजी हाउस हुआ करता था, जिसमें आवारा पशुओं को पकड़ कर बन्द किया जाता था लेकिन एक दशक पूर्व विपरीत आर्थिक हालातों के चलते उसे नीलाम कर दिया गया। उसके बाद ही क्षेत्र के हालात बिगड़ते चले गए। आज पालिका के पास न तो गौशाला है और न ही कांजी हाउस।
हजारों की तादाद में भूख से हिंसक होते मवेशी अब क्षेत्रीय जनता की जान के दुश्मन बन चुके है, जो प्रतिदिन किसी न किसी को घायल कर रहे है। जिम्मेदार नहीं दे रहे जवाबइस मुद्दे पर जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए है। जवाब नहीं दे रहे। पालिका के अधिशासी अधिकारी राहुल मित्तल ने फोन नहीं उठाया, न ही संदेश पर इस मुद्दे पर जानकारी मांगने पर जवाब देना उचित समझा।

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned