कभी बीनते थे कचरा तो कभी मांगते थे भीख, अब आंखों में तैर रहे बड़े सपने

बाल सदन के बच्चे अपने जैसे साथियों के साथ रफ्ता रफ्ता जिन्दगी को हंसी खुशी गुजार रहे हैं।

By: सोनम

Published: 14 Nov 2017, 08:41 AM IST

सोनम राणावत/अजमेर।

बच्चों की एक मुस्कुराहट हर किसी के जीवन में खुशियां भर देती है। लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिनमें किसी को ममता का आंचल नहीं मिला तो कोई पिता के प्यार को तरस रहा है। मगर दयानंद बाल सदन के बच्चे अपने जैसे साथियों के साथ रफ्ता रफ्ता जिन्दगी को हंसी खुशी गुजार रहे हैं। सदन के बच्चों ने पत्रिका से बातचीत में अपना दर्द भी बयां किया तो खुशी के पलों को भी शेयर किया।

सौतेले पिता करते थे पिटाई

छह वर्षीय बाबू (बदला हुआ नाम) व आठ वर्षीय सविता (बदला हुआ नाम) ने बताया कि पिता की मौत के बाद मां ने दूसरी शादी कर ली और हमें छोड़ कर दूसरे पापा के साथ चली गई जिनसे उनके दो बच्चे भी हैं। पापा आए दिन हम दोनों भाई बहन की पिटाई करते थे ।

इसलिए नानाजी ने हमारी देखभाल के लिए मम्मी पापा दोनों के नहीं होने पर हमें कोर्ट के माध्यम से बाल सदन भेज दिया । यहां हमें परिवार से भी ज्यादा अच्छा लगता है। यहां सब लोग हमारा बहुत ध्यान भी रखते हैं।
पिता मांगते थे भीख, मैं बीनती थी कचरा
नवीं कक्षा में पढऩे वाली कविता (बदला हुआ नाम) ने बताया कि बजरंगगढ़ चौराहे पर पिताजी भीख मांगते थे और मैं भी वहीं कचरा बीनने का काम करती थी। पिता की मौत के बाद मुझे बाल सदन भेज दिया गया। मेरी शिक्षा दीक्षा यहीं से हुई है। हाल ही में मेरा राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली में आयोजित होने वाली खेलकूद प्रतियोगिता में सौ मीटर दौड़ में चयन हुआ है।

बड़ा होकर पुलिस बनूंगा
कुछ समय पहले डांगावास जमीन कांड में 11 वर्षीय राजेन्द्र (बदला हुआ नाम) के पिता सहित परिवार के छह लोगों की मौत हो गई थी। इससे पारिवारिक स्थिति कमजोर हो गई इसलिए रिश्तेदारों ने यहां बाल सदन में भेज दिया। राजेन्द्र ने नम आंखों से कहा कि बड़ा होकर पुलिस बनना चाहता हूं ताकि मेरे परिवार के साथ जैसी घटना हुई वैसा किसी और बच्चे के साथ न हो।

सोनम Reporting
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