घुलने लगा हवाओं में जहर

एक्यूआइ 250 से अधिक, जांचने की नहीं है प्रशासनिक व्यवस्था भट्टा नगरी, राजाखेड़ा बनता जा रहा गैस चैम्बर

राजाखेड़ा क्षेत्र में स्थापित 100 से अधिक अवैध ईंट भट्टों की सुलगती भट्टियों से एक बार फिर राजाखेड़ा गैस चैम्बर बनने के हालात की ओर अग्रसर होता जा रहा है। हालात यह हैं कि मौजूदा समय में 50 फीसदी भट्टों की चिमनियां ही सुलग पाई है और एक्यूआई (एअर क्वालिटी इंडेक्स) 250 से 300 तक पहुंच रहा है। जो निर्धारित 50 की सीमा से 5 गुना तक अधिक है।

By: Dilip

Published: 21 Oct 2020, 11:13 PM IST

राजाखेड़ा. राजाखेड़ा क्षेत्र में स्थापित 100 से अधिक अवैध ईंट भट्टों की सुलगती भट्टियों से एक बार फिर राजाखेड़ा गैस चैम्बर बनने के हालात की ओर अग्रसर होता जा रहा है। हालात यह हैं कि मौजूदा समय में 50 फीसदी भट्टों की चिमनियां ही सुलग पाई है और एक्यूआई (एअर क्वालिटी इंडेक्स) 250 से 300 तक पहुंच रहा है। जो निर्धारित 50 की सीमा से 5 गुना तक अधिक है।

डब्ल्यूएचओ प्रदूषण के चलते सर्द ऋतु में कोरोना के फिर आक्रमण की चेतावनी जारी कर रहा है, वहीं भट्टा नगरी बन चुका राजाखेड़ा वायु प्रदूषण के नित नए आयाम तैयार कर रहा है।

खतरनाक तथ्य यह है कि राजाखेड़ा प्रशासन के पास इस प्रदूषण को नापने की सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं है। बचाव के साधन होना तो दूर की बात है। यह हैं कारण क्षेत्र में बड़ी संख्या में भट्टे अवैध रूप से संचालित हैं, जो प्रदूषण मंडल की सूची तक मे नहीं है। इसके अलावा जिनके पास मंडल का प्रमाण पत्र है, वे भी उसकी गाइड लाइन की पालना नहीं करते। अधिकांश भट्टे कोयला की जगह सरसों की तूड़ी का उपयोग भट्टियों में करते हैं, जो कोयले के मुकाबले कीमत में तो कई गुना कम है, लेकिन प्रदुषण कई गुना अधिक करती है। दीपावली बाद जब अधिकांश भट्टे सुलग कर काम शुरू कर देंगे, तब हवा में प्रदूषण की स्वीकृत मात्रा सीमा से दस गुना तक पहुंच जाती है। जो लोगों की सांसों को घोंटने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

क्या है एयर क्वालिटी इंडेक्स

हवा में जहरीले तत्वों यथा पीएम 2.5 पीएम 10 आदि को जांचने के लिए तय किया गया पैमाना ही एयर क्वालिटी इंडेक्स कहलाता है। जिसके अनुसार एक्यूआई 50 तक की हवा को ही स्वास्थ्य के लिए उम्दा माना जाता है। इसके बढऩे के साथ साथ ही हवा में जहर की मात्रा बढ़ती चली जाती है। यह एक्यूआई वर्तमान में ही 250 से 300 के बीच चल रहा है, जो स्वीकृत सीमा से 5 से 6 गुना अधिक है, तो दीपावली तक क्या हालत होंगे, इसे सोच कर ही लोग चिंतित हैं।
नही है जांच की सुविधा

सारे प्रकरण में चिंताजनक तथ्य यह है कि प्रशासन के पास इनके द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण को नापने की किसी भी प्रकार की कोई सुविधा नहीं है। सभी जिम्मेदार एक दूसरे पर जिम्मेदारी टालते नजर आते हैं। लोगों को प्रदूषण के स्तर की जानकारी भी अनेक निजी वेबसाइट द्वारा ही उपलब्ध हो पा रही है, लेकिन प्रशासनिक अक्षमता के चलते वह मजबूर नजर आ रहे है। कुछ भी करने की हालत में नहीं दिख रहे हैं।
अब तक नही जिगजैग

तथ्य यह है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए विभिन्न न्यायालयों से राजस्थान में संचालित सभी भट्टों को आधुनिक जिगजैग तकनीक से संचालित करने और इसमें असफल रहने पर बन्द करने के निर्देश जारी हो चुके हैंं, लेकिन क्षेत्र में अभी तक इस तकनीक के दर्शन किसी भी भट्टे पर नहीं हो पाए है। मोटे मुनाफे के बाद भी महंगी तकनीक से संचालित कर प्रदूषण कम करने के स्थान पर भट्टा मालिक निजी फायदे के लिए पुरानी भट्टियों से ही हवा को जहरीला बनाने में लगे हुए है। न्यायालय से ही आससारे प्रकरण में आमजन की उम्मीद की किरण बस न्यायालय से ही दिखाई देती है।

अभी एक सप्ताह पूर्व ही एक स्थानीय फौजी के प्रार्थना पत्र पर स्थानीय न्यायालय ने नदोरा गांव में बन रहे एक ईंट भ_ा के निर्माण को सुनवाई पूरी होने तक रोक दिया था। लेकिन अब तक स्थापित हो चुके 100 से अधिक भट्टों को जो अब आबादी के बीच में आ चुके हैं, रोकने की कोई व्यवस्था नही की गई है। इनका कहना है स्थानीय स्तर पर प्रदूषण को नापने की कोई व्यवस्था नहीं है। यह कार्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल का है। इस सम्बंध में हमने मंडल को पत्र लिखकर यहां संचालित भट्टों की सूची मांगी है। जिससे कार्रवाई की जा सकेगी।

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