ऐसे भी थे राजनेता..खुद ठुकरा देते थे टिकट, देते थे किसी और को मौका

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By: raktim tiwari

Published: 30 Dec 2018, 08:14 AM IST

दिलीप शर्मा/अजमेर.

अब से पचास वर्ष पहले की राजनीति का माहौल ही कुछ और होता था। दावेदार या समर्थक की संपन्नता, प्रभाव व जाति को नहीं देखा जाता था। टिकट घर भेज कर चुनाव लडऩे का आग्रह किया जाता था। प्रदेश मुख्यालय व आला नेताओं को जरुर आत्मविश्वास में रखा जाता था ताकिआलाकमान का सम्मान के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचे। जुबान तो ऐसी होती कि चुनाव लडऩे का आग्रह यदि पहले किसी ने कर दिया तो स्वयं पीछे हट जाते थे। तब एक दूसरे की भावनाओं को बेहत गंभीरता सेलिया जाता था।

हम बात कर रहे हैं आज से पचास वर्ष पहले1968 की। मेवाड़ के गांधी के नाम से प्रख्यात गांधीवादी नेता चांदमल सकलेचा की। जीवन पर्यन्त सकलेचा कोई चुनाव नहीं लड़ा केवल पार्टी ने जो जिम्मेदारी उन्हें सौंपी उसे बखूबी निभाया एक बार तो पार्टी ने टिकट की पेशकश की तब वहां के ठाकुर परिवार की बेटी ने उनसे आग्रह किया कि वह भी युवा है और उन्हें चुनाव का मौका दिया जाना चाहिए। इस पर सकलेचा पीछे हट गए।

लक्ष्मी देवी चूंडावत
ठाकुर परिवार की यह बेटी देवगढ़ राव साहब की बहन लक्ष्मी कुमारी चूंडावत थी। रानी लक्ष्मी कुमारी चुंडावत की बहन सीता देवी थी जो पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की पत्नी थी। देवगढ़ परिवार की बेटियों ने अजमेर के मेयो कॉलेज में पढ़ाई की। इसके बाद ही लक्ष्मी देवी चूंडावत बाई सा के नाम से जानी गई जो स्थानीय विधायक एवं प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा भी बनी और राजस्थानी साहित्य के क्षेत्र मे उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री से भी सम्मानित की गयीं।सकलेचा की वेशभूषा श्वेत वस्त्र थे। वह केवल दो ही पोशाक का उपयोग करते थे।

पहनते थे धोती-कुर्ता
ंधोती, कुर्ता ,टोपी रुमाल, मफलर यहां तक कि थेला भी खादी का होता था। व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कभी किसी अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल नहीं किया। छोटा बेटा बिट्स पिलानी से प्रथम श्रेणी में ओनर्स में इंजीनियरिंग की। उसे नौकरी के लिए कई जगह ठोकरें खानी पड़ी। नौकरी के दौरान उसके पिछले 8 साल में उसके 18 ट्रांसफर हुए तब भी उनका स्पष्ट कहना था । अगर नौकरी करनी है तो सरकार जहां भी भेजे वहां जाने के लिए तैयार रहो, उनसे किसी प्रकार की सिफारिश की उम्मीद मत रखो। जबकि वह डिस्ट्रिक्ट बोर्ड तथा खादी ग्रामोद्योग मंडल के चेयरमैन रह चुके थे।

लिखते थे डायरी

पिछले 50 वर्षों तक वे नियमित अपने जीवन काल में प्रतिदिन डायरी लिखा करते थे जो गांधी डायरी लिखते थे । बड़ी डायरी गांधी डायरी कहलाती थी ,जबकि छोटी डायरी गीता दैनंदिनी कहलाती थी। ंअंतिम 18 सालों में गांधी डायरी नियमित रूप से लिखी और 95 वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हुआ उन्होंने जीवन भर कभी अपने निजी स्वार्थ के लिए राजनीति प्रभाव का इस्तेमाल नहीं किया यहां तक कि क्षेत्र में दो निजी बस ऑपरेटर ने फ्री पास दे रखा था फिर भी उन्होंने बस का यात्री कर सरकारी टैक्स के रूप में राशि अदा किया। भारतीय जीवन बीमा निगम मे प्रशानिक अधिकारी के पद से सेवा निवृत्त बी. एल. सामरा सकलेचा के सगे फूफा हैं। इन्होंने राजस्थान पत्रिका को सकलेचा के संस्मरण सुनाए। सकलेचा के छोटे पुत्र का ललित कुमार सखलेचा है जो सामरा के हम उम्र हैं। वर्तमान मे राज्य सरकार के कौशल विकास विभाग मे सेवारत हैं।

raktim tiwari Reporting
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