इकलौता विद्यालय एक शिक्षक के भरोसे

40 हजार की आबादी और एक उच्च प्राथमिक विद्यालय

कोरोना के बाद से ही बंद पड़े विद्यालयों के लाखों छात्रों को शिक्षण के लिए ऑनलाइन जोडऩे के नाम पर सरकार स्माइल कार्यक्रम का संचालन करने का दावा कर रही है लेकिन राजाखेड़ा शहरी क्षेत्र के हालात सरकार के दावों के बिल्कुल उलट है, जहां का एकमात्र राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय वर्षो से एक शिक्षक के भरोसे संचालित होकर अपने पतन की ओर अग्रसर हो रहा है।

By: Dilip

Published: 09 Jan 2021, 11:16 PM IST

राजाखेड़ा. कोरोना के बाद से ही बंद पड़े विद्यालयों के लाखों छात्रों को शिक्षण के लिए ऑनलाइन जोडऩे के नाम पर सरकार स्माइल कार्यक्रम का संचालन करने का दावा कर रही है लेकिन राजाखेड़ा शहरी क्षेत्र के हालात सरकार के दावों के बिल्कुल उलट है, जहां का एकमात्र राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय वर्षो से एक शिक्षक के भरोसे संचालित होकर अपने पतन की ओर अग्रसर हो रहा है।

क्या है मामला

निवर्तमान सरकार के एकीकरण कार्यक्रम के तहत ग्रामीण क्षेत्र के कम नामांकन वाले विद्यालयों को पंचायत मुख्यालय के उच्च मध्यमिक विद्यालय की स्थापना कर समायोजित कर दिया था। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के हालात तो सुधर गए और एकीकरण की प्रक्रिया से उनमें कमोबेश अध्यापकों की संख्या भी खासी बढ़ गई। लेकिन इस प्रक्रिया में शहरी क्षेत्र में छात्रों की बड़ी संख्या के बावजूद प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों को एकीकृत तो कर दिया गया, लेकिन उनमें संसाधन बढ़ाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। ऐसे में यहां के हालात इस प्रक्रिया के बाद से बिगड़ते चले गए।

क्या हैं हालात ..

वर्तमान में नगरपालिका क्षेत्र के 35 वार्डो की आबादी ४0 हजार अनुमानित हैं। जिसके लिए एक मात्र उच्च प्राथमिक विद्यालय अम्बरपुर गांव में स्थित है। इस विद्यालय में भी पिछले आधा दशक में मात्र एक अध्यापक कार्यरत है। जिस पर भी प्रधानाध्यापक, पोषाहार प्रभारी व अन्य जिम्मेदारियां हैं। ऐसे में यहां शिक्षण कार्य तो लगभग बन्द ही पड़ा हुआ है। नामानकन मात्र 300 पर सिमट गया है।

जरूरतमंद छात्रों का एक मात्र आसरा ..

एकीकरण की गलत नीतियों के चलते क्षेत्र में इकलौते बचे इस विद्यालय में सिर्फ गरीबों के बच्चे ही नामांकन कराते हैं। लेकिन यहां के विपरीत हालातों के चलते वे भी विमुख होते जा रहे हैं। नामांकन मात्र 300 पर आ गया है। कुकुरमुत्तों की तरह उग आए निजी विद्यालयों में गरीबों को भी मजबूरन पहुंचना पड़ रहा है, जो उनकी क्षमता में तो नहीं है, पर गरीब भी अब अपने बच्चों को शिक्षित करने की आस रखता है, जो इनसे पूरी नहीं होती । दर्जनों ज्ञापन, पर बहरी है सरकारपूर्व पार्षद सरजू देवी के अनुसार उन्होंने पिछले 3 वर्षों में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, उपखंड अधिकारी, जिला कलक्टर से लेकर शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री तक को कम से कम एक दर्जन ज्ञापन सौंपे हैं लेकिन जमीनी हालात दिखाने के बाद भी सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की जा रही। नतीजतन सरकारी विद्यालय मृतप्राय: होते जा रहे हैं। लोगों को कर्ज लेकर निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को मजबूरी में भेजना पड़ रहा है।

कहां से आए स्माइल

सरकारी विद्यालय के इन हालातों में सरकार के महत्वाकांक्षी स्माइल कार्यक्रम यहां औपचारिक प्रतीत हो रहे है और शिक्षा के मामले में इनके चेहरों पर स्माइल की जगह घोर निराशा ही दिखती है।

इनका कहना है
मैं सरकारी कर्मचारी हूं। मुझे कुछ कहने का अधिकार नहीं है। सारा सिस्टम ऑनलाइन है। नीचे से ऊपर तक सबको पता है।

भानूप्रताप सिंह, अध्यापक, राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, राजाखेड़ा।

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