हाईकोर्ट ने प्रिंसिपल व दरोगा पर 50- 50 हजार का लगाया हर्जाना

हाईकोर्ट ने प्रिंसिपल व दरोगा पर 50- 50 हजार का लगाया हर्जाना
इलाहाबाद हाईकोर्ट

Akhilesh Kumar Tripathi | Publish: Jul, 26 2019 08:37:57 PM (IST) Allahabad, Allahabad, Uttar Pradesh, India

कोर्ट ने डीजीपी उ.प्र. को प्रदेश में कानून व्यवस्था एवं पुलिस विवेचना के तरीके पर दिशा निर्देश जारी करने का निर्देश दिया है, ताकि लोगों का विश्वास कायम रह सके।

प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने के.एन. काटजू इंटर कॉलेज प्रयागराज के प्रधानाचार्य राम नरायन द्विवेदी एवं शिव कुटी थाने में तैनात दरोगा विवेचनाधिकारी शिव चरण राम पर 50 -50 हजार हर्जाना लगाया है। याची नवल डे भारती के खिलाफ झूठी शिकायत करने व मनमानी विवेचना कर चार्जशीट दाखिल करने के मामले को न्यायिक प्राक्रिया दुरूपयोग मानते हुए कोर्ट ने यह हर्जाना लगाया है। कोर्ट ने याची के खिलाफ दाखिल चार्जसीट व न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी सम्मन आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने डीजीपी उ.प्र. को प्रदेश में कानून व्यवस्था एवं पुलिस विवेचना के तरीके पर दिशा निर्देश जारी करने का निर्देश दिया है, ताकि लोगों का विश्वास कायम रह सके। यह आदेश न्यायमूर्ति एस.के. सिंह ने नवल डे भारती की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।


याची के खिलाफ प्रधानाचार्य ने राज्य अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की परीक्षा 2016 की द्वितीय पाली में उत्तर पुस्तिका लेकर भाग जाने के आरोप में कीडगंज थाने में एफआईआर दर्ज करायी। याची का कहना था कि उसने परीक्षा के बाद पुस्तिका परीक्षक को दे दी थी। विवेचना पुलिस ने पुस्तिका बरामद नहीं की। बिना ठोस दस्तावेजी साक्ष्य के बयान के आधार पर चार्जशीट दाखिल कर दी और मजिस्ट्रेट ने प्रोफार्मा आदेश भरकर सम्मन आदेश जारी कर दिया। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक आदेश प्रोफार्मा आदेश नहीं होने चाहिए, विवेक का इस्तेमाल कर आदेश जारी किये जाने चाहिए। विवेचक ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि परीक्षा स्थल पर सीसीटीवी कैमरा लगा था या नहीं और बिना सबूत चार्जशीट दाखिल कर दी।

कोर्ट ने कहा है कि अपराध की विवेचना संविधान के अनुच्छेद 20 एवं 21 के तहत जीवन के मूल अधिकार का हिस्सा है। विवेचना निष्पक्ष, भेदभाव रहित, व कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा परीक्षा अधिनियम 1982 की धारा 3/10 में एफआईआर दर्ज की गयी है, इसका अस्तित्व ही नहीं है। कोई अपराध बनता ही नहीं। कोर्ट का दायित्व है कि वह निर्दोष व्यक्ति के हितों की रक्षा करे। व्यर्थ की शिकायत न्याय को विफल करती है। कोर्ट लोगो के जीवन व वैयक्तिक स्वतंत्रता के हनन पर अपनी आँखे मूदे नहीं रह सकती। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्राक्रिया के दुरूपयोग के मामले में पीड़ित को हर्जाना पाने का अधिकार है। कोर्ट ने दो माह में हर्जाना बैंक ड्राफ्ट के जरिये महानिबंधक के समक्ष जमा करने का आदेश दिया है और कहा कि 80 हजार याची को और 20 हजार लीगल एड कमेटी को दिया जाये ।

 

BY- Court Corrospondence

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