हाईकोर्ट ने 20 साल जेल में बिताने वाले आरोपी को किया बरी, महिला ने लगाया था दुष्कर्म का झूठा आरोप

- कोर्ट ने कहा - पीड़िता की गवाही विश्वसनीय नहीं
- 2003 में एक ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश रद्द

By: Neeraj Patel

Published: 02 Mar 2021, 08:47 PM IST

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट हाल ही में 20 साल जेल में बिताने वाले आरोपी को बलात्कार के मामले में बरी कर दिया है। इस मामले में भूमि विवाद के कारण एक महिला ने उसके खिलाफ झूठा बलात्कार का केस दायर किया था। न्यायमूर्ति डॉ कौशल जयेंद्र ठाकर और न्यायमूर्ति गौतम चैधरी की खंडपीठ ने एक विष्णु की रिहाई का आदेश पारित करते हुए, वर्ष 2003 में एक ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया है। ट्रायल कोर्ट ने आईपीसी की धारा 376 और 506 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 की धारा 3 (2) (वी) रिड विद 3 (1) (xii) के तहत विष्णु को दोषी करार दिया था।

इस मामले में हाईकोर्ट का कहना है कि हम राज्य की तरफ से पेश एजीए द्वारा प्रस्तुत दलीलों के साथ खुद को सहमत करने में असमर्थ हैं कि वह अत्याचार के साथ-साथ बलात्कार का शिकार हुई है और इसलिए, आरोपी के साथ नरमी से नहीं पेश आना चाहिए। न्यायालय ने आगे कहा कि पीड़िता की एकमात्र गवाही, यदि विश्वसनीय हो तो अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है। हालांकि,वर्तमान मामले में यह देखा गया है कि पीड़िता को स्टर्लिंग गवाह नहीं कहा जा सकता है और वह अदालत के विश्वास को प्रेरित नहीं कर पाई है। यानि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय नहीं पाई गई।

इस मामले में प्राथमिकी सितंबर 2000 में दर्ज की गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता 5 महने की गर्भवती थी और अपने ससुर के लिए दोपहर का भोजन देने जा रही थी। तभी रास्ते में आरोपी ने उसे पकड़ लिया और जमीन पर पटक दिया और फिर उसका यौन शोषण किया। उनका यह भी कहना था कि पीड़िता की जाति के कारण यह घटना हुई थी और इस तथ्य की जानकारी आरोपी को थी। इसके अलावा, पीड़िता के अनुसार आरोपी ने उसे धमकी दी थी कि वह घटना के बारे में किसी को न बताए, वरना बुरे परिणाम भुगतने पड़ेंगे। इसलिए उसके परिवार के सदस्य तीन दिन तक पुलिस स्टेशन नहीं गए। उसके बाद उसके ससुर ने प्राथमिकी दर्ज करवाई थी।

ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद, अपीलकर्ता ने 2005 में जेल के माध्यम से तत्काल अपील को प्राथमिकता दी थी, जो 16 वर्षों की अवधि के लिए डिफेक्टिव रही। इस डिफेक्टिव अपील को लिस्टिंग एप्लिकेशन के रूप में लिया गया था और कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा एक विशेष उल्लेख के साथ दायर किया गया था कि अभियुक्त 20 साल से जेल में बंद है।

बयानों में पाया गया विरोधाभास

हाईकोर्ट ने कहा कि सबसे दुर्भाग्यपूर्ण, इस मुकदमेबाजी का पहलू यह है कि अपील को जेल के माध्यम से दायर किया गया था। यह मामला 16 साल की अवधि के लिए एक डिफेक्टिव मामले के रूप में रहा और इसलिए, आम तौर पर डिफेक्टिव अपील संख्या का उल्लेख नहीं करते हैं लेकिन इसका उल्लेख किया है। कोर्ट ने इसके बाद पीड़िता और उसके परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों की सत्यता की जांच की और निष्कर्ष निकाला कि उनके बयानों में काफी विरोधाभास पाया गया है, जो उनके मौखिक साक्ष्यों को अविश्वसनीय बना रहा है।

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