Magh Mela 2021: संगम की रेती पर अतिथि देवो भव का पाठ

  • विदेशी जान रहे कल्पवास का राज, सीख रहे भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूल्य
  • कर रहे हैं रिसर्च गंदगी में भी क्यों नहीं फैलता संक्रमण, क्यों नहीं होती फूड प्वाइजिनिंग

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

प्रयागराज. संगम तट पर लगने वाले विशाल माघ मेले को लेकर विदेशियों में अलग ही क्रेज देखने को मिल रहा है। कुछ को यहां का आध्यात्म खींच लाया है तो कुछ वो मैनेजमेंट देखने के लिये आ रहे हैं कि कोरोना काल में भी इतना बड़ा मेला इतनी सफलता से कैसे आयोजित हो रहा है। पर कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें आध्यात्म के साथ ही भारतीय सनातनी परम्परा और मूल्य खींच लाए हैं। सात समुंदर पार से आए कई विदेशी मेहमान माघ मेले का हिस्सा बनकर कल्पवास को नजदीक से जानने में जुटे हैं। रोज-रोज भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूल्यों को सीख और आत्मसात कर रहे हैं। वो यहां भारत के सेवा भाव और अतिथि सत्कार की परंपरा को बेहद करीब से जानने की कोशिश कर रहे हैं। कल्पवास कैसे होता है, इस दौरान साधू संत और श्रद्घालु किस तरह का जीवन जीते हैं इसके बारे में जानने में जुटे हैं।


माघ मेेले में कई विदेशियों को सेवा भाव से श्रद्घालुओं और संतों की सेवा करते देखा जा सकता है। माघ मेले में अमेरिका, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड समेत देशों से आए सेवादारों का सेवा भाव देखने लायक है। विदेशी पुरुष और महिलाएं भारतीय परंपरा और सनातनी मूल्यों का निर्वहन कर सीखने में जुटे हैं। पौष पूर्णिमा से पहले कई देशों से विदेशी माघ मेले में पहुंचकर कल्पवास कर रहे हैं।


सेक्टर दो स्थित ओम वाहेगुरू ऋषि आश्रम के शिविर का अलग ही नजारा है। न्यूजीलैंड से आए मैक्रोनी समेत दो दर्जन से अधिक विदेशी संतों और भक्तों की सेवा करने वालों के साथ जुटे हैं। शिविर के अन्नक्षेत्र में इन विदेशियों को सेवा करते देखा जा सकता है। अन्नक्षेत्र में सुबह 11 बजे से शाम छह बजे तक संतों और भक्तों की लंबी-लंबी कतारें लगती हैं। इनकी सेवा में जहां देशी श्रद्घालु जुटे हैं तो वहीं विदेशी भी इसके जरिये सेवा भाव सीख रहे हैं।


मैक्रोनी ही नहीं अमेरिका में रेस्टोरेंट चलाने वाले निक्सन हों या फिर इंगलैंड की क्रिस्टोना, इन सभी का सेवा भाव मीडिया और माघ मेले की चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रसाद बांटतते निक्सन,पूड़ियां बेलतीं क्रिस्टोना और संतों की सेवा में जुटे मैक्रोनी जैसे विदेशियों को भारत की सनातनी परम्परा का आकर्षण संगम तट पर खींच लाया है।


ये विदेशी न सिर्फ परंपरा सीखने आए हैं बल्कि ज्यादातर विदेशियों में एक उत्सुकता ये भी है कि इतना बड़ा मेला आयोजित होता है, लेकिन न तो गंदगी फैलती है और न ही संक्रमण। लोग लम्बी लम्बी कतारों में साथ बैठकर खुले में भोजन करते हैं, लेकिन किसी तरह की फूड प्वायजनिंग की शिकायत सामने नहीं आती। इसको लेकर विदेशी रिसर्च कर रहे हैं। माघ मेले के आयोजन का अभूतपूर्व इंतजाम उनके लिये मैनेजमेट के एक सबक की तरह है।

रफतउद्दीन फरीद
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