भारतीय संस्कृति बनी विश्व धरोहर ,यूनेस्को ने दिया कुम्भ मेले को सांस्कृतिक विरासत का दर्जा

Prasoon Pandey

Publish: Dec, 08 2017 11:02:35 AM (IST)

Allahabad, Uttar Pradesh, India
भारतीय संस्कृति बनी विश्व धरोहर ,यूनेस्को ने दिया कुम्भ मेले को सांस्कृतिक विरासत का दर्जा

आस्था के महाकुम्भ की महान परम्परा को दुनिया ने दिया सम्मान

इलाहाबाद भारतीय संस्कृति की प्रतिक आस्था विश्वास और धर्मिक परम्परा की परिचायक संगम की रेती की महत्ता को दुनिया ने भी सहर्ष स्वीकार किया है।प्रयाग की धरती पर लगने वाले कुंभ मेले को जो सम्मान दुनिया के पटल पर मिला वह अतुलनीय है।उससे भारत की धार्मिक संस्कृति और परम्परा गौरवान्वित है।सदियों से लगने वाले महाकुंभ अर्धकुंभ मेले को यूनेस्को ने अपनी मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि सूची में शामिल किया है। कुंभ मेला यूनेस्को सूची में शामिल हुआ इसकी जानकारी वहां के संगठन ने ट्विटर के जरिए दी।संयुक्त राष्ट्र के सांस्कृतिक निकाय की विश्व धरोहर समिति ने दक्षिण कोरिया के जेजू में हो रहे अपने 12वें सत्र में कुंभ मेले को इस सूची में रखने की मंजूरी प्रदान की। इसके पहले से स्पेन नृत्य से लेकर इंडोनेशिया की वाटिका कला तक 350 से अधिक परंपराएं कला रूप में इस सूची में पहले से दर्ज हो चुकी है। साथ ही दुनिया के तमाम पारम्परिक रश्म और धार्मिक मान्यता वाली रश्मे शामिल है।

संगम की रेती पर गंगा यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी घाट पर हर साल लगने वाले सनातन धर्म के सबसे बड़े मेले को यूनेस्को ने सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है। धार्मिक मान्यताओं वालो आस्था के इस मेले में धर्म और पुण्य की डुबकी लगाने वाले करोडो श्रधालुओ की भीड़ ने दुनिया को सात समन्दर पार से यहाँ आकर्षित किया है।सदियों से लग रहे इस आस्था के महाकुम्भ की महान परम्परा को अब दुनिया ने सम्मान दिया है। 2001 के बीते महाकुंभ या कहें कि सदी के पहले महाकुंभ को देख कर दुनिया की नजरें संगम की रेती में आकर टिक गई।दुनिया की भागती हुई रफ़्तार और जिन्दगी को सुकून देने सबसे ज्यादा युवा संगम की रेती पर आ रहे है। हर साल 12 वर्षो पर महाकुंभ हर 6 वर्षो पर अर्धकुंभ का आयोजन प्रयाग की रेती पर होता है। सदी के महाकुंभ ने दुनिया को इस कदर आकर्षित किया की अंतर्राष्ट्रीय जगत में अपनी छाप छोड़ दी।

धर्म और आस्था के प्रतिक के तौर पर दुनिया में स्थापित धर्म की अदभुत परम्परा को इक्कसवी सदी में यूनेस्को ने सांस्कृतिक विरासत का दर्जा देकर विश्व में देश ही नही बल्कि धर्म का भी मान बढाया है।संगम नगरी जितना महत्वपूर्ण धर्म के लिए है।उतना की विज्ञान भी इस परम्परा से आकर्षित है।2001 के कुंभ को देश भर की मीडिया के साथ दुनिया के कैमरे में इस कदर कैद किया और दिखाया की दुनिया देखती रह गई। जिससे देश ही नही बल्कि विश्व क्व अलग लग हिस्सों में रह रहे भारतीय लोगो को उनकी मिट्टी ने बुलाया। सदियों से टेंट और कनात में महीने भर के लिये बसने वाले संगम की रेती के इस शहर ने दुनिया आश्चर्य चकित कर दिया है।भारतीय सनातन संस्कृति और भारत के सनातनी समाज के लिए जितना धार्मिक व पौराणिक महत्व संगम नगरी का है। उतना ही दुनिया के लिए यह आकर्षण का विषय है। बीते कुम्भ के बाद विदेशी सरकारों ने यहाँ के अधिकारियों को बुला कर यह जाना था की इसे किस तरह सफल बनाते है

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