तीन साल पहले नाबालिग से हुआ था बलात्कार, तभी से लापता है बालिका, कोर्ट ने अलवर एसपी को दिया यह बड़ा आदेश

तीन साल पहले नाबालिग से हुआ था बलात्कार, तभी से लापता है बालिका, कोर्ट ने अलवर एसपी को दिया यह बड़ा आदेश
तीन साल पहले नाबालिग से हुआ था बलात्कार, तभी से लापता है बालिका, कोर्ट ने अलवर एसपी को दिया यह बड़ा आदेश

Sujeet Kumar | Publish: Sep, 21 2019 03:03:12 PM (IST) Alwar, Alwar, Rajasthan, India

अलवर कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक से तीन साल से लापता नाबालिग को एक माह में पेश करने के आदेश दिए हैं।

अलवर. विशिष्ट न्यायालय (पोक्सो एक्ट संख्या-3) के न्यायाधीश राजेन्द्र शर्मा ने प्रतापगढ़ इलाके से 39 माह से लापता 14 वर्षीय बालिका को एक माह में दस्तयाब करने के अलवर पुलिस अधीक्षक को आदेश दिए हैं। साथ ही प्रकरण का अनुसंधान किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से कराने के आदेश दिए हैं। न्यायालय ने सुनवाई के लिए 23 अक्टूबर की तारीख तय की है।

प्रकरण में अनुसार 14 जून 2016 को एक व्यक्ति ने प्रतापगढ़ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसकी 14 वर्षीय भतीजी को सोहनलाल कोली और रजनीश रैगर बलात्कार के लिए बहला-फुसलाकर भगा ले गए। प्रतापगढ़ थाने के अनुसंधान अधिकारी ने ना तो पीडि़ता को बरामद किया तथा ना ही नामजद मुल्जिमों को गिरफ्तार किया। बल्कि मुल्जिमों से मिलकर एफआर लगाकर अदालत में रिपोर्ट पेश कर दी। परिवादी ने 173 (3) सीआरपीसी के तहत न्यायालय में प्रार्थना पेश किया। जिसमें बताया कि आरोपी सोहनलाल कोली और रजनीश रैगर के भगा ले जाने के बाद से ही पीडि़ता को पता नहीं कि वह जिंदा है या फिर उसे मौत के घाट उतार दिया। प्रार्थना पत्र में पत्रावली को अग्रिम अनुसंधान के लिए सम्बन्धित पुलिस अधिकारी को भेजने की गुहार की।

न्यायालय ने याचिका को स्वीकार करते हुए प्रतापगढ़ थाना पुलिस की ओर से पेश एफआर पत्रावली को पुलिस अधीक्षक अलवर को भेजते हुए निर्देश दिए हैं कि वह अपने निर्देशन में किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से एफआईआर संख्या 54/2016 में अनुसंधान करवाकर पीडि़ता को एक माह के अंदर दस्तयाब कराएं।

सरसरी जांच के बाद पेश की एफआर?

विशिष्ट न्यायाधीश राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि अनुसंधान अधिकारी सर्वप्रथम पीडि़ता को बरामद करता तथा जिन व्यक्तियों पर शक है, उनसे कठोर पूछताछ करके प्रकरण में विधि अनुसार नतीजा पेश करना चाहिए था, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अनुसंधान अधिकारी ने सरसरी तौर पर अनुसंधान कर एफआर लगा दी है। पीडि़ता को दस्तयाब करने की कोशिश ही नहीं की और ना ही इस सम्बन्ध में तफ्तीश की गई है कि पीडि़ता के साथ किस प्रकार का अपराध कारित हुआ है तथा किन व्यक्तियों ने अपराध कारित किया है। यदि कोई अपराध नहीं हुआ है तो पीडि़ता कहां चली गई।

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