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अलवर के युवा स्वामी विवेकानंद से क्यूं है प्रभावित

विश्व में युवाओं के प्रणेता रहे स्वामी विवेकानंद ने अलवर के युवाओं में अलख जगाई। वे अपने जीवनकाल में कई बार अलवर आए और प्रवचन, गीत, धर्म चर्चा आदि के माध्यम से अलवर जिले के युवाओं को जागृत किया।

अलवर

Published: January 11, 2022 11:33:59 pm


अलवर. विश्व में युवाओं के प्रणेता रहे स्वामी विवेकानंद ने अलवर के युवाओं में अलख जगाई। वे अपने जीवनकाल में कई बार अलवर आए और प्रवचन, गीत, धर्म चर्चा आदि के माध्यम से अलवर जिले के युवाओं को जागृत किया। स्वामीजी की प्रेरणा का ही नतीजा है कि राजस्थान सरकार ने वर्ष 2013 में युवा एवं खेल विभाग का अलग से गठन किया। वहीं युवाओं को जागृत करने के लिए नेहरू युवा केन्द्र की स्थापना की। युवाओं को प्रेरणा देने के लिए स्वामी विवेकानंद चौक पर 2 अगस्त 1970 को उनकी मूर्ति का अनावरण किया गया।
अलवर के युवा स्वामी विवेकानंद से क्यूं है प्रभावित
अलवर के युवा स्वामी विवेकानंद से क्यूं है प्रभावित
परिवाचक अवस्था में नरेन्द्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) ने 7 फरवरी से 31 मार्च 1891 तक अलवर में प्रवास कर अलवर शहर में मालाखेड़ा गेट पांच दरवाजों के बाहर टीले पर प्रवचन दिए। इतना ही नहीं अलवर पूर्व रियासत के तत्कालीन शासक मंगलसिंह (1872-92 ई.) से महल में वार्ता हुई। वहीं दीवान रामचंद्र की हवेली, लाला गोविंद सहाय विजयवर्गीय, पं. शंभूनाथ इंजीनियर के घर पर प्रवचन हुए।
डॉ. गुरूचरण के निवास पर बना है स्वामी विवेकानंद स्मारक

सरकारी अस्पताल के प्रमुख बंगाली डॉक्टर गुरूचरण लश्कर के निवास (वर्तमान में सीएमएचओ कार्यालय) पर स्वामीजी कई सप्ताह रहे और संध्या वंदना, धार्मिक चर्चा, मोलवीजी से धर्म की गूढ़ बातें, प्रार्थना सभा, भक्ति गीत आदि कार्यक्रम हुए। इस दौरान उनकी एक मित्र मंडली बन गई। यह मित्र मंडली स्वामीजी के बंगाली गीतों को मधुर कंठ स्वर लहरी से गाते और उसकी व्याख्या करते। कुछ युवाओं ने स्वामीजी के गीत कंठस्थ याद किए और उनके साथ बिजली घर चौराहे से शहर परकोटे के भीतर यह टोली गीत गाती और वाद्य यंत्रों को बजाती हुई शहर में भ्रमण करती थी। इस स्थान का 17 अगस्त 2018 को स्वामी विवेकानंद स्मारक के रूप में उद्घाटन हुआ। स्वामीजी ने उस दौरान अलवर शहर, पाण्डुपोल हनुमान मंदिर, नीलकंठ महादेव, नारायणी माता के भी दर्शन किए।
अलवर की जनता ने किया स्वामीजी का सम्मान
इतिहासकार एडवोकेट हरिशंकर गोयल बताते हैं कि स्वामी विवेकानंद 1897 में दूसरी बार अलवर आए, तब अलवर की जनता ने उनका सम्मान किया। उन्हें राजमहल में ठहराया गया। स्वामीजी ने भक्तों के साथ धार्मिक चर्चा की। बड़े सम्मानित लोगों ने आमंत्रित किया, लेकिन स्वामीजी अपने पुराने साथियों के यहां गए और भोजन किया। स्वामीजी बाजरे की मोटी रोटियां खाकर प्रसन्न हुए। वे रमता वैष्णव रामस्नेही के यहां पहले दिन रूके। राम स्नेही लोटे से घडिय़ा बजाकर गीत गाते थे।
स्वामीजी के प्रमुख शिष्य थे लाला गोविंद विजयवर्गीय

स्वामीजी के अलवर में प्रमुख शिष्य लाला गोविंद सहाय विजयवर्गीय थे। उनके परिवार के पास आज भी स्वामीजी के दो पत्र मौजूद हैं। पं. शंभूनाथ इंजीनियर, डॉ. गुरूचरण लश्कर, मुंशी जगमोहन, फैज अली, नारायण दास शास्त्री थानागाजी वाले, दीवान कर्नल रामचंद्र परिवारके पास स्वामीजी के कुछ पत्र थे। जिन्हें शोधार्थी ले गए, उनके 10-12 शिष्य बने। प्रोफेसर डॉ. बनर्जी, राजा प्यारे मोहन कॉलेज उत्तरापरा हुगली से अलवर आकर स्वामीजी के अलवर प्रवास पर कार्य किया। डॉ. सुगनाबाई और उनकी बहन भी स्वामीजी की शिष्य बनी। अलवर के पूर्व शासक जयसिंह ने 1924 में स्वामी विवेकानंद और रामाकृष्ण परमहंस के साहित्य को हिन्दी में प्रकाशन करने दो हजार रुपए भेजे और सहयोग की बात कही।
जाति-पांति मत मानों, इश्वर को पाने के लिए निगुण-सगुण साधन करो

स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रवचन में संदेश दिया कि जाति- पांति मत मानों और इश्वर को पाने के लिए निगुण- सगुण साधन करो। इश्वर को पाने के लिए मूर्ति पूजा मात्र माध्यम है। हिन्दू धर्म के तात्विक मूल्यों पर प्रश्न उत्तर के रूप में स्वामीजी ने प्रवचन किया। उन्होंने कहा कि हमारे राष्ट्र के जीवन के केन्द्र बिंदु आध्यात्म एवं धर्म है। मानव सेवा चरित्र निर्माणकारी शिक्षा, व्यावहारिक धर्म तथा नारी जाति का उत्थान हमारी ज्वलंत आवश्यकता है।

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