अलवर से एक कविता रोज: हॉर्न बजाता चल तू शोर मचाता चल, लेखक: संदीप यादव

हॉर्न बजाता चल तू शोर मचाता चल
सड़क है तेरे बाप की धौंस दिखाता चल
सामने ये कौन आया उसकी ये मजाल
तोड़ दे उसके कानो के परदे का जाल
कही वो ये न सोच ले की तू है किसी से कम
सबके भ्रम के परदे हटाता चल

By: Lubhavan

Published: 10 Sep 2020, 07:11 PM IST

हॉर्न बजाता चल तू शोर मचाता चल
सड़क है तेरे बाप की धौंस दिखाता चल
सामने ये कौन आया उसकी ये मजाल
तोड़ दे उसके कानो के परदे का जाल
कही वो ये न सोच ले की तू है किसी से कम
सबके भ्रम के परदे हटाता चल


वो गाड़ी की पिछली सीट पर सो रहा है
तेरे रहते ये क्या हो रहा है
तू जा उसके पास से जा
हॉर्न बजा तेज और उसको उठा


देख तेरे आगे कौन चल रहा
ये क्यों इतना ब्रेक ले रहा
गाली दे इसको और तेज हॉर्न दे
कभी ना अपनी गाड़ी पे ब्रेक ले


सिग्नल हो गया ग्रीन
और सामने वाला अभी तक गतिहीन
वो तो सड़क को पार्क समझ कर आया
हे प्रभु तेरी कैसी माया


अगर हॉर्न नहीं बजाएगा तो कौन तुझे पहचानेगा
तू भी गुजरा था कभी इन राहों से कौन जानेगा
लोगो की सोयी आत्मा को तू ही तो जगाएगा
तेरा क्या वज़ूद गर तू शोर ना मचाएगा


तू न कभी धीरे चल
तेज गति से मचा हलचल
कोई जो सामने आये
तो हॉर्न बजाता चल


तू कभी ना सीधा चल
कभी ना दे मुड़ने का सिग्नल

पीछे वाले को पूरा दे गाली देने का मौका
वो भी तो कुछ बजाए तू उसको सुनता चल द्य
उधर मोदी जी स्वयं तेरी प्रतीक्षा कर रहे


उफ़ए और कहाँ ये राहगीर दीवारों से टक्कर ले रहे
ध्वनि प्रदुषण बढ़ रहा तो बढे तुझे क्या
लोगो में अनेक बीमारियां बढ़ रही तुझे क्या
शांत शहर बन गया चिड़ियाघर
पर तू ना फिकर कर
तू तो अपनी मस्ती के गीत गाता चल
हॉर्न बजाता चल तू हॉर्न बजाता चल

लेखक - संदीप यादव
पद - आयकर निरीक्षक, भारत सरकार -- स्थायी पता - गण्डाला, बहरोड़

Lubhavan Desk
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned