अलवर से एक कविता रोज: 'मंज़िलों तक हौसले रखने पड़ेंगे' कवि- राम चरण राग , अलवर

मंज़िलों तक हौसले रखने पड़ेंगे' कवि- राम चरण राग , अलवर

By: Lubhavan

Published: 02 Sep 2020, 06:15 PM IST

मंज़िलों तक हौसले रखने पड़ेंगे*


है अगर दुख तो , दुखों को गुनगुनाओ
आँख में अब आँसुओं को तुम न लाओ
शूल हैं माना चमन में आज , लेकिन -
फूल की मुस्कान अधरों पर सजाओ


छल - कपट के पैंतरे चलते अनवरत
और होगा दिल हज़ारों बार आहत
भूल कर तुम, वक्त की सब यातनाएं
रख हृदय में कर्म की दृढ़ भावनाएं

हाथ से अपने नया इतिहास रच कर
तुम इसी मृत - लोक में अमरत्व पाओ


कालिमा लेकर अगर जो भोर आए
दोपहर का सूर्य भी जो तमतमाए
मंज़िलों तक हौंसले रखने पड़ेंगे
काँच टूटे - खार पाँवों में गड़ेंगे

मौत की परवाह बिन लड़ते रहो,तब
ज़िन्दगी की जीत का उत्सव मनाओ

हर तरफ़ जब रात का अँधियार छाए
स्याह बादल भी गरज कर जब डराए
मौन साधे धैर्य का दीपक जलाना
साथ उसकी ज्योति के तुम टिमटिमाना

देखना पल में तिमिर ये दूर होगा
तुम सुरों में राग अब भैरव सुनाओ

राम चरण राग , अलवर

Lubhavan
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