अलवर से एक कविता रोज: प्यारे दिल तुम क्यों रोते हो- लेखक प्रवेंद्र पंडित

प्यारे दिल तुम क्यों रोते हो।
खुद के दुश्मन क्यों होते हो।

जब जब गैर लगे अपनापन।
तब तब याद करो तुम बचपन।
चित की उपजाऊ धरती पर।
बीज विरह के क्यों बोते हो।

By: Lubhavan

Published: 23 Sep 2020, 04:44 PM IST

प्यारे दिल तुम क्यों रोते हो।
खुद के दुश्मन क्यों होते हो।

जब जब गैर लगे अपनापन।
तब तब याद करो तुम बचपन।
चित की उपजाऊ धरती पर।
बीज विरह के क्यों बोते हो।

कटु के सँग सँग मृदु भाषा है।
और निराशा सँग आशा है।
चटक दिवस को भी तुम पगले।
रात मानकर क्यों सोते हो।

पतझड़ है तो सावन भी है।
जावन है तो आवन भी है।
आँखों के बंधन खोलो अब।
सुखद नजारे क्यों खोते हो।

प्रतिपल धीरज से बतियाओ।
बेचैनी को पास न लाओ।
खुशियों से भरपूर जगत में।
ग़म की गठरी क्यो ढोते हो।

(प्रवेन्द्र पण्डित)

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