अलवर से एक कविता रोज: रिश्तों की अहमियत, लेखिका- अनुराधा तिवाडी

चांद तारों की छांव में,
सब खाट बिछा कर सोते थे |
ना चोरी का डर था
ना कत्ल के किस्से होते थे||

By: Lubhavan

Published: 07 Sep 2020, 07:16 PM IST

रिश्तो की अहमियत

चांद तारों की छांव में,
सब खाट बिछा कर सोते थे |
ना चोरी का डर था
ना कत्ल के किस्से होते थे||

भले ही उस किसान ने
दो रोटी में दिन गुजारा था|
पर उसे बेईमानी की विलासिता से ज्यादा,
अपना स्वाभिमान प्यारा था|

साझे में रहते थे सब ,
संपत्ति के लिए धरती मां के बंटवारे के किस्से ना थे|
तब एक घर के कई कई हिस्से ना थे||
अपने अौदे का ना किसी को अभिमान था|
बस परिवार के हर सदस्य में
प्यार और सम्मान था||

गाड़ी बंगले खरीदने जैसा
ना कोई अमीर था |
पर अपनों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने का हर शख्स में जमीर था||

इतना खूबसूरत जहां का नजारा था|
ऐसा प्यारा देश हमारा था ||

पर प्रकृति में जब बदलाव आया|
पैसे की कीमत समझी सब ने पर अनमोल रिश्तो की अहमियत कोई ना समझ पाया||
पहले होते तो परिवारों में दोस्ती के किस्से|
अब होते हैं भाइयों में दुश्मनी के रिश्ते||
अब हर कोई अपने परिवार के रिश्तों से आजादी चाहता है
और गैरों में अपनापन ढूंढ कर नए नए स्वार्थी रिश्ते बनाता है|
अब जा रहे हैं हम अपनी इंसानियत खोते|
किस कदर छोड़ देते हैं अपने मां-बाप को रोते||
आसमान में बैठे फरिश्ते न होते,
अगर धरती पर जुल्मों सितम के किस्से ना होते|

अनुराधा तिवाडी
43 नेहरू नगर NEB, अलवर

Lubhavan Desk
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned