अलवर का घंटाघर : कभी मुझे आगे बढ़ता था शहर, अब मैं चुप हूं क्योंकि जिम्मेदारों का ध्यान नहीं है!

Alwar Ghanta Ghar : अलवर का घंटाघर आज बदहाली के आंसू बहा रहा है। कभी इस घड़ी को देखकर शहर आगे बढ़ता था, आज इसकी दुर्दशा पर कोई ध्यान नहीं दे रहा।

अलवर. पहले मुझे देख शहर गतिमान रहता था, लेकिन अब वह थम सा गया है क्योंकि मेरे सिर पर लगी घड़ी की सुइयां आगे-पीछे नहीं हो रही। तभी तो मेरे चारों ओर आवारा पशुओं का जमघट रहने के बाद भी किसी को दिखाई नहीं देता। गंदगी के ढेर में मुंह मारते लावारिस पशु भी नगर परिषद को नजर नहीं आते। मेरी ओट में ट्रैफिक पुलिस व होमगार्ड के कई जवान दिन भर नौकरी कर पगार लेते हैं, लेकिन यातायात व्यवस्था को कोई नहीं संवारता। लोग भी मुझे निहारने के बजाय मेरी दुर्दशा को घूर आगे बढ़ जाते हैं। मेरे आसपास दो पहिया-चार पहिया वाहनों का जमावड़ा ऐसा कि लोगों को मेरे सौंदर्य को निहारने के बजाय खुद को संभालने का ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है।

मेरे मन को ज्यादा पीड़ा तब होती है जब लोग शहर के विकास का पहिया घूमने की बात करते हैं। तब मेरे मन में विचार आता है कि इससे भला तो वह जमाना था जब शहर की सूरत संवारने में मेरे नीचे पीसे जाने वाले चूने का भरपूर उपयोग होता। जब तक मेरे नीचे गरठ चला तब तक शहर की सूरत संवरती रही। जब पहिया जड़ हुआ तब मैने शहर को दिशा दिखाने का काम ले लिया। मेरे ऊपर खड़े रहने वाले परसादी की याद मुझे रह-रह कर सताती है।

वह दिन भर हाथ से ट्रैफिक सिग्नल दिखा शहर को दिशा दिखाता था। अब मैं न तो शहर की सूरत संवार पा रहा और न ही शहर को दिशा दे पा रहा, क्योंकि मैं अब थम गया हूं, शहर के विकास का दावा करने वाले प्रशासन का मुझ पर ध्यान नहीं। लावारिस पशु और गंदगी ने मेरी सूरत बिगाड़ दी है। ट्रैफिक व्यवस्था भी बदहाल है, तभी तो मैं कहता हूं कि मेरा समय कब सुधरेगा।

Lubhavan
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