होपसर्कस: जिले की राजनितिक उठा-पटक अलग अंदाज मे, जाने क्या हो रहा है शहर में

शासन प्रशासन से जुड़ी ताजा घटना अलग अंदाज में

By: Prem Pathak

Published: 24 Jul 2018, 12:01 PM IST

इन्हें भी देख लेंगे

अब पार्टी ऊपर से निगाह रखने में कसर तो नहीं रख रही है पर नीचे वालों के हाथ और पहुंच बहुत लंबे हैं। पार्टी ने प्रभारी बदले तो अंदरखाने चर्चा शुरू हो गई कि ये साहब तो चुनावों के हिसाब से ऑपरेशनल जिम्मा संभालेंगे। ऐसे में पोलपटी, मनमानी, अहंकार, पार्टी में विरोधियों को निपटाने का खेल नहीं चल पाएगा। इस पर दबी जुबान में एक पीडि़त ने जयपुर में आयोजित बड़े जलसे में कह ही डाला कि भाई बाकी सब तो ठीक है यहां के दो भाई तो किसी के काबू में नहीं आएंगे। ये नए प्रभारी को भी अपने तेवर दिखा देंगे।

कद बढ़ा है या निपटा है

जिले के एक नेताजी के समर्थकों को सूझ नहीं रहा है कि बधाई दें या सांत्वना दें। क्योंकि पांच सालाना उत्सव से पहले ही भाईसाहब को बाहर कहीं की कमान थमा दी है। पहले से ही बड़ी पंचायत के उपचुनाव में इन्हें या यूं कहें कि शुभचिंतकों को झटका लगा था। तब उम्मीद थी कि छोटी पंचायत में मौका मिलेगा। मौका नहीं मिलेगा ये तो नहीं कह सकते हैं लेकिन दूर भेजने के अर्थ तो कई निकल रहे हैं। खैर, इस बीच चुगलखोरों का कहना है कि भाईसाहब वैसे भी ग्रामीण क्षेत्र में काम करने में माहिर हैं। जिले में भी एक भाईसाहब केटाइमपास के लिए क्षेत्र विशेष के गांवों में दौरे होते रहे हैं। उम्मीद है कि दिन जरूर फिरेंगे।

लहरें गिनने का फन

अपने पढ़ाई लिखाई वाले जनपद के महकमें में एक साहब लहरें गिनने के फन में माहिर हैं। अजी वही पुरानी कहानी। राजा ने बेईमान अफसर को हटाकर समुद्र की लहरें गिनने का काम दे दिया। तो इन हुजूर ने वहां भी राज्यादेश का हवाला देकर जहाजों से वसूली शुरू कर दी। अब आधुनिक हुजूर ने लहरों की बजाय तरंगों के काम में ही अपना रंग दिखा दिया।

इसे कहते हैं पॉजीटिव नजरिया

अपने कुछ भाईलोगों की चापलूसी के फन के क्या कहने? अब देखें जनता गड्डों में सडक़ ढूढ़ते हुए आए दिन दुर्घटनाओं का शिकार हो जाती है। जिम्मेदार खेमे के एक नेता से बार-बार उनके आराध्य नेता की शिकायत की गई तो जवाब क्या आता है? भाई गांव में पहले क्या होता था? विकास के नाम पर कई बार ऐसा होता है। जनता को विकास के लिए इंतजार करना चाहिए? अब सडक़ टूटी है तो बनेगी भी। नीचे लाइन भी बिछी हैं वह भी जनता के लिए है। अब इन चापलूस को कौन समझाए कि मामला विकास का नहीं बल्कि लापरवाही का है। ये रास्ते कहीं आने वाले समय में गले न पड़ जाएं।

साहब की टाइमिंग या देव योग

अब इसे सिर मुंडाते ही ओले पडऩा तो नहीं कहेंगे पर जिम्मा मिलते ही फसाद से स्वागत होना कह सकते हैं। एक साहब की टाइमिंग देखिए। तबादला हुआ और तत्काल रिलीव। इधर, दूसरे की टाइमिंग देखिए सुबह पदभार संभालने वाले थे और रात को ही राष्ट्रीय हंगामे के बीज बो दिए गए। स्वागत तो छोड़ो यहां आते ही पलक झपकने की फुर्सत नहीं मिल रही है। ऊपर से भाईलोगों ने रात को ही खुद को हिटविकिट कर महकमे पर दाग लगा दिया। मामला अब राज्य के बूते से भी बाहर है। ऐसे में यह ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो आने वाला समय बताएगा। यह जरूर है कि इस अग्नि परीक्षा में खरे उतरे तो नाम खूब होगा

अब लाठी पीटने का खेल

लाठी लेकर बाघ-बघेरों की सुरक्षा करने वाले अब लाठी पीटने का खेल भी खेलने लगे हैं। पांच महीने पहले गायब हुईबाघिन को तलाश कर भाई लोग थक गए। तीसरी आंख भी जवाब दे गई तो साहब की आस ही टूट गई। अब साहब को मकहमे की तौहमत बचाने की चिंता सताने लगी तो खेलने लगे लाठी पीटने का खेल। साहब की चिंता देख भाई लोग भी हो गए सक्रिय और पहुंचा दिया कुएं में कंकाल। अब इन्हें कौन समझाए कि जिसके लिए अब लाठी पीट रहे हैं, वह तो कभी की जंगल से विदा हो गई। अब कुओं में कंकाल पटको या हड्डियां क्या फर्क पडऩे वाला है। वैसे भी छुपा छुपी के खेल से किसी का कुछ बिगडऩे वाला तो है नहीं। तभी तो एक साहब पहले ही जंगल छोडकऱ वादियों में जा चुके हैं, बचे हैं उनका भी क्या बिगडऩे वाला है। रही बात सबूत की तो कुएं सलामत हैं, कहीं से भी कंकाल लाकर डाल दो, सबूत उनमें दिखा ही देंगे।

Prem Pathak Reporting
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