उदयपुर गांव में शव दफनाने को नहीं बची कब्रिस्तान में जमीन, लगानी पड़ती है गुहार

उदयपुर गांव में शव दफनाने को नहीं बची कब्रिस्तान में जमीन, लगानी पड़ती है गुहार

भिवाड़ी. कहते हैं कि अंत में इंसान को दो गज जमीन चाहिए। लेकिन अब लगता है कि कहीं यह कहावत सिर्फ कहावत ही बनकर न रह जाए। क्योंकि अब इंसान को दो गज जमीन मिलना भी मुश्किल होता जा रहा है।

धर्मेद्र दीक्षित

भिवाड़ी. कहते हैं कि अंत में इंसान को दो गज जमीन चाहिए। लेकिन अब लगता है कि कहीं यह कहावत सिर्फ कहावत ही बनकर न रह जाए। क्योंकि अब इंसान को दो गज जमीन मिलना भी मुश्किल होता जा रहा है। जमीन की कमी और कीमत इंसान पर भारी पडऩे लगी है। कुछ ऐसा ही दृश्य भिवाड़ी नगर परिषद के उदयपुर गांव में बीते आठ-10 सालों से देखने को मिल रहा है। यहां ग्रामीणों को शव दफनाने के लिए जमीन नहीं मिल रही है। 



कब्रिस्तान कब्रों से भर गया


भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र स्थित उदयपुर गांव की आबादी करीब तीन हजार है। जिसमें से ढ़ाई हजार मुस्लिम, पांच सौ में पंजाबी, हरिजन और वाल्मीक समाज के हैं। गांव में करीब एक बीघा भूमि पर कब्रिस्तान था। जिसमें इंतकाल होने पर शव दफनाए जाते थे। धीरे-धीरे गांव की आबादी बढ़ी और शव दफनाने की संख्या भी बढ़ती गई। करीब 10 साल पहले कब्रिस्तान कब्रों से भर गया। तब से गांव में शव दफनाने को लेकर बड़ी समस्या है। गांव में मृत्यु होने पर सवाल खड़ा हो जाता है कि अब शव दफनाया कहां जाएगा। गांव की आबादी के लिहाज से हर महीने एक दो शव दफनाने पड़ते हैं। 



तीन सौ परिवारों के पास जमीन नहीं


मुस्लिम समाज के गांव में करीब पांच सौ परिवार हैं। जिनमें से करीब तीन सौ परिवारों के पास जमीन नहीं है। जिन परिवारों के पास जमीन है वे स्वयं की जमीन में शव दफनाते हैं। जिन परिवारों के पास जमीन नहीं है वे गांव के अन्य लोगों की जमीन में शव दफनाते हैं। लेकिन गांव में जमीन की कमी और कीमत लगातार बढ़ रही है। एक बीघा की कीमत करोड़ों में है। 



अपनी जमीन पर शव दफनाने को तैयार नहीं


अब हर कोई अपनी जमीन पर शव दफनाने को तैयार नहीं होता। कब्र बनने के बाद जमीन की कीमत समाप्त हो जाती है। गांव के लोग कब्र की जमीन का हिसाब भी निकाल लेते हैं, कहते हैं कि एक कब्र के लिए औसतन 50 हजार की जमीन चाहिए। जिसकी वजह से गांव में कई बार बड़ी अजीबोगरीब स्थित पैदा हो जाती है। मृतक के परिजनों को गांव के कई लोगों से शव दफनाने के लिए जमीन मांगनी पड़ जाती है। गुहार लगानी पड़ती है। 



यूआईटी से मांग कर चुके


पार्षद पति शब्बीर अहमद ने बताया कि कब्रिस्तान की जमीन 10 साल पहले समाप्त हो चुकी है। जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और भिवाड़ी यूआईटी से कई बार कब्रिस्तान की मांग कर चुके हैं। गांव में कब्रिस्तान के लिए जमीन न होना सबसे बड़ी समस्या है, जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। साल भर में खातेदारी की जमीन में चार से पांच शव दफनाते हैं।



जमीन न होना बड़ी परेशानी


ग्रामीण अब्दुल खान ने कब्रिस्तान के लिए जमीन न होना बड़ी परेशानी है। भिवाड़ी यूआईटी गांव की समस्या को दूर कर सकती है। इसके लिए यूआईटी से कई बार मिल चुके हैं। लेकिन अभी तक विभाग ने समस्या के समाधान के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं। 

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