अलवर के उच्च अधिकारियों ने अपनी सफलता का श्रेय दिया शिक्षकों को, जानिए उनकी सफलता की कहानी

अलवर के उच्च अधिकारियों ने अपनी सफलता का श्रेय दिया शिक्षकों को, जानिए उनकी सफलता की कहानी

Hiren Joshi | Publish: Sep, 05 2018 03:44:47 PM (IST) Alwar, Rajasthan, India

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अलवर . पांच सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इस दिन शिक्षकों को उनकी सेवाओं के लिए सम्मान किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कई एेसे शिक्षक होते हैं जो उस व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाते हैं। हमने शिक्षक दिवस पर समाज के कुछ एेसे चुनिंदा लोगों से बातचीत की तो उन्होंने अपनी मन की बात इस प्रकार व्यक्त की।

गुरु का जीवन में विशेष स्थान

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के पूर्णकालिक सचिव पवन जीनवाल ने बताया कि मेरे जीवन में भी गुरु का महत्वपूर्ण स्थान है । ना केवल स्कूल स्तर पर अपितु जब मैं अपने कॅरियर को लेकर संशय की स्थिति मैं था, तब मेरे पिता ने मेरा मार्ग प्रशस्त किया। मैं उनका नाम लेने में आज जरा भी संकोच महसूस नहीं करता हूं । भंवर लाल शर्मा एवं रामलाल चौधरी मेरे आदर्श गुरु है । शिक्षा सिर्फ गुरु के माध्यम से ही नहीं दी जाती है ऐसा हर व्यक्ति जिसने जीवन में कभी भी कोई संस्कार मानवीय मूल्यों एवं एक अच्छा इंसान बनने में मदद की हो वह हर व्यक्ति गुरु की श्रेणी में आता है। गुरु के बिना जीवन अधूरा है। गुरु ही है जो शिष्य को सही मार्ग दिखाता है और आगे बढऩे के लिए प्रेरित करता है।

शिक्षक का महत्वपूर्ण स्थान: राजेंद्र सिंह

अलवर. जिला पुलिस अधीक्षक राजेन्द्र सिंह का कहना है कि हर किसी व्यक्ति के जीवन में शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्कूल, कॉलेज और परिजनों से गुरू के रूप में मिलने वाली शिक्षा ही व्यक्ति के जीवन को एक आकार प्रदान करती है। उन्हें सबसे ज्यादा उनके कॉलेज के शिक्षक और परिजनों ने प्रभावित किया। उनके अनुशासन और नियमिति रूप से कक्षाएं लेना काफी प्रेरणादायक रहा। साथ ही परिजनों ने भी कठोर त्याग और परिश्रम किया। आज वह जो कुछ भी हैं उसके पीछे विशेषकर कॉलेज शिक्षकों और परिजनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। सभी को अपने शिक्षकों का पूरा सम्मान करना चाहिए। साथ ही गुरू को भी अपने शिष्य के जीवन को संवारने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

मां ने डाला जीवन में प्रभाव

वरिष्ठ अधिवक्ता राजश्री एडवोकेट का कहना है कि मेरे जीवन में शिक्षक से ज्यादा महत्व मेरी मां का है क्योंकि आज उन्हीं की शिक्षाओं की बदौलत में यहां तक पहुंची हुं।। जब में 11 - 12 साल की हुई और मां को लगा कि मैं बड़ी हो गई हूं। उन्होंने सबसे पहली शिक्षा दी कि अपने स्वाभिमान को कभी छोडऩा, यदि तुम पत्थर बनकर रहोगी तो लोग तुम्हें पैरों से मारेंगे और स्वाभिमान के साथ खड़ी रहोगी तो कोई तुम्हें छू नहीं सकता। यह मेरी मां की पहली शिक्षा थी। आज मैं वकालत के पेशे में रहकर महिलाओं के लिए काम कर रही हूं। यह मेरी मां की बदौलत ही है। मैं कुछ और बनना चाहती थी, लेकिन उन्होंने कहा कि तुम्हें वकील बनना चाहिए क्योंकि महिलाओं के साथ अन्याय होता है तो उसके साथ कोई लडऩे वाला चाहिए। पुरुष ही वकालत कर सकते हैं ऐसा नहीं हैं तुम उनसे अच्छी वकालत कर सकती हो। जब 1980 में एलएलबी की तो उस समय नाईट कॉलेज चलते थे, लड़कियां रात में घर से बाहर नहीं जाती थी। लेकिन मेरी मां ने मुझे नाईट कॉलेज में प्रवेश दिलवाया और मैं रात को कॉलेज जाती थी। एक सबसे अच्छी सीख जो मेरी हमेशा काम आई वो यह है कि मेरी मां कहती थी कि हर आदमी के पास 24 ही घंटे होते हैं इन 24 घंटों का वह कैसे उपयोग करता है । यह उस पर ही निर्भर करता है। शिष्य के जीवन को संवारने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

माता-पिता मेरे सबसे बड़े गुरु

पुलिस उपाधीक्षक (शहर उत्तर) डॉ. प्रियंका रघुवंशी का कहना है कि वे स्वयं टीचिंग लाइन से रही हैं। सीखना एक सतत प्रक्रिया है, जो जीवनभर जारी रहती है। उन्हें जीवन में समय-समय पर गुरू मिलते रहे, जिनसे उन्हें काफी कुछ सीखने का मिला। उनके जीवन में माता-पिता की भूमिका सबसे बड़े गुरू के रूप में रही है। डॉ. प्रियंका माथुर और अशोक गुप्ता की भी उनके जीवन में एक गुरू के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनका मानना है कि हर व्यक्ति के जीवन में शिक्षक ही सही मार्गदर्शक होता है।

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