इस मां की बेबसी और इस बेटी के दर्द को अखिलेश जी आप भी सुनिए!

कोई मां और बेटी गरीबी और लाचारी से कैसे बेबस होती है, ये हम आज आपको दिखायेंगे। सरकार गरीबों के लिए योजनाओं के नाम पर रोज ढिंढोरा पीटती है

By: Ruchi Sharma

Published: 29 Aug 2016, 04:16 PM IST

अम्बेडकर नगर. कोई मां और बेटी गरीबी और लाचारी से कैसे बेबस होती है, ये हम आज आपको दिखायेंगे। सरकार गरीबों के लिए योजनाओं के नाम पर रोज ढिंढोरा पीटती है। कहीं प्रदेश की अखिलेश सरकार इसकी बेटी उसका कल लेकर दौड़ रही है तो कहीं केंद्र सरकार 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान चलाकर बेटियों को सुखी और समृद्ध बनाने का बखान कर रही हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि जो इन योजनाओं के जरूरतमंद हैं, उनतक न तो यह योजनाएं पहुंच रही हैं और न ही योजनाओं को संचालित करने वाले अफसर।
 
हम बात कर रहे हैं एक ऐसे लाचार और बेबस मां बेटी की, जो टांडा विकास खंड क्षेत्र के एक गांव मलिक पुर में रहते हैं। इस लाचार बेटी के सर से 2009 में पिता का साया क्या उठा। इस परिवार पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। बिपता नाम की इस वृद्ध महिला की कुल तीन बेटियों में से दो की शादी हो चुकी है, लेकिन उनमें से एक बेटी की हत्या दहेज़ के लिए उसके ससुराल वालों ने कर दिया। अनीता नाम की यह सबसे छोटी बेटी जो पढ़ने लिखने का शौक तो रखती है, लेकिन मजबूरी और अपने नाजुक कन्धों पर मां की जिम्मेदारी ने इसे पढ़ाई से दूर कर दिया। इस बूढी मां का एक बीटा भी है, जो शादी के बाद ही इस लाचार मां और मासूम बहन से किनारा कर लिया। अब कही किसी बड़े शहर में अपने परिवार के साथ रह रहा है, जिससे न तो अपनी मां से कोई मतलब है और न ही इस भोली बहन से।


Ambedkar nagar
घर के नाम पर छप्पर और खाने के नाम पर फांके, दहशत में गुजरती है रात

बेटी अनीता ने बताया कि उसके बाप की मृत्यु 2009 में ही हो गई थी और भाई शादी के बाद कही अपना परिवार लेकर चला गया, जो कभी इन दोनों के लिए किछ नहीं करता। माकन के नाम पर उसने बताया कि यही छप्पर है जिसमें दरवाजा तक नहीं है। रात में सोने में दहशत लगती है। उसका दर्द छलका तो उसने अपना मुंह घुमा लिया, फिर सामान्य होते हुए बताया कि वह पढ़ना चाहती थी, लेकिन उसके लिए अब पढ़ाई से ज्यादा उसकी मां की देखभाल जरूरी है। जिसके लिए वह गांव में ही लोगों के घर मजदूरी कर किसी तरह गुजारा कर लेती है। 

अगर वह मजदूरी न करे तो उसे और उसकी मां को रोटी नसीब नहीं होगी। अनीता ने बताया कि इस छप्पर के अलावा उसके पास कोई जमीन भी नहीं है। सरकार की कोई योजना इस परिवार को आजतक नहीं मिल सकी हैं। उसने बताया राशन कार्ड के नाम पर सूची में नाम तो बताया जा रहा है, लेकिन अभी मिलता कुछ नहीं है।

इस बेबस बेटी की लाचार बूढ़ी मां जिसका नाम ही बिपता है, वह भी अपनी इस बिपत्ति को बताते बताते रो पड़ती है। मां का कहना है कि अब उसकी इस बेटी का ही सहारा है, लेकिन मजबूरी में उसकी जिम्मेदारी नहीं निभा पा रही है। वह साफ़ तौर पर अपनी बेटी की बढती उम्र को देख कर डरती हुई दिखाई पड़ रही हैं। उन्होंने कहाकि अब बिटिया सयानी हो रही है इस लिए उन्हें डर भी लगता है। घर है नहीं, छप्पर में दरवाजे नहीं है ऐसे में जमाने के हालात को देखते हुए इस मां का डर लाजिमी है। उन्होंने बताया कि मजदूरी के सहारे ही वह और उनकी बेटी जी रहे हैं, लेकिन अब बेटी की शादी की फ़िक्र उन्हें और परेशान कर रही है।

कहाँ रह गई इन तक पहुंचने वाली योजनायें

बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि गरीबों के लिए आवास, गरीब बेटियों के लिए शादी अनुदान, वृद्धावस्था पेंशन और जाने कौन कौन सी योजनायें जो इन गरीबों से वोट लेने के नाम पर चुनाव के दौरान दिखाई गई थी। आखिर परिवार और उनकी बेटियों के भविष्य को लेकर इतनी चिंता करने वाली सरकारें क्यों नही पहुंचा पा रही है ऐसे बेबस और लाचार बेटियों को मदद। जिस मलिकपुर गाँव की हम बात कर रहे हैं यह गांव टांडा विकास खंड से मात्र दो से ढाई किलोमीटर की दूरी पर है और योजनाओं का अभी दूर दूर तक पता नहीं है।

ग्राम प्रधान शांति देवी से भी हमने बात किया तो उन्होंने बताया कि ये मा बेटी वास्तव में बहुत ही गरीब हैं, जिनके कई कई दिन खाने के भी लाले पड़ जाते हैं, आवास के लिए प्रस्ताव किया तो गया, लेकिन ऊपर के अधिकारियों ने नामंजूर कर दिया। इन मां बेटी के पास राशन कार्ड अभी तक नहीं था, लेकिन अब बन गया है, जल्द ही अनाज मिलने लगेगा। उन्होंने बताया कि गांव के लोग मिलकर इस लड़की की मदद किया करते हैं। लेकिन जिन अधिकारियों की ऐसे परिवारों की मदद की जिम्मेदारी मिली हुई है, जब वे अपने एयर कंडीशन आफिस से बाहर निकलेंगे तभी तो उन्हें ऐसे परिवारों की वास्तविक जानकारी हो पाएगी।
Ruchi Sharma
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned