घटिया राहत सामग्री वितरण से बाढ़ पीड़ितों में आक्रोश, प्रशासन पर उठ रहे सवाल

घटिया राहत सामग्री वितरण से बाढ़ पीड़ितों में आक्रोश, प्रशासन पर उठ रहे सवाल

Mahendra Pratap Singh | Publish: Sep, 03 2018 01:10:08 PM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

बाढ़ पीड़ितों में घटिया राहत सामग्री वितरण से लोगों में सरकार के प्रति आक्रोश बना हुआ है।

अम्बेडकर नगर. यूं तो बाढ़ प्रभावित गांवों में सूबे की सरकार सहायता सामग्री वितरित करवा रही है लेकिन इस सहायता सामग्री की गुणवत्ता क्या है इस पर शायद ध्यान नहीं दे रही है। यही कारण है कि बाढ़ राहत सामग्री को लेकर अब सरकार से लेकर शासन में बैठे जिम्मेदारों की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। वितरण की गई राहत सामग्री में कुछ चीजें ऐसी हैं जिसको न तो ग्रामीण खा रहे हैं और न ही उनके पालतू जानवर, अलबत्ता ग्रामीण इसे फेंक रहे हैं। फिलहाल इस राहत सामग्री को लेकर जिला प्रशासन भी अपने बचाव में उतर आया है और उस खाद्य सामग्री का उपयोग न करने का फरमान जारी कर दिया है।

बाढ़ पीड़ितों के लिए सरकार के थे ये निर्देश

प्रदेश में हर साल बाढ़ की तबाही से हजारों गांवों में तबाही का मंजर सामने आता है, जिसको लेकर सरकार हर साल करोड़ों रुपए उनके पुनर्वास और खाने पीने के लिए राहत सामग्री पर खर्च करती है। यूपी सरकार ने बाढ़ग्रस्त जिलों के बाढ़ पीड़ित लोगों के जख्मों पर अपनी सहायता सामग्री से मरहम लगाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी लेकिन इसकी गुणवत्ता पर ध्यान न देना परेशानी का सबब बनती जा रही है। हालांकि सरकार ने बाढ़ राहत सामग्री को वितरित करने के लिए शासन स्तर पर टेंडर प्रक्रिया अपनाई है।

जिले की आलापुर तहसील क्षेत्र के माझा कम्हरिया, अराजी देवारा, सहित लगभग एक दर्जन गांव सरयू नदी के किनारे बसे होने के नाते बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। शासन के फरमान के अनुसार जिला प्रशासन ने बाढ़ प्रभावित गांवों में जनप्रतिनिधियों के सहयोग से शासन से मिलने वाली सहायता सामग्री किट, जिसमें आटा, चावल, दाल और लइया सहित अन्य खाद्य सामग्री का वितरण करवाया है।

लाई खाने से खराब हो रही है तबियत

बाढ़ प्रभावित ग्रामीणों को जब ये सहायता सामग्री मिली तो वे काफी खुश हुए, लेकिन जब सहायता सामग्री में मिली। जब लइया को खाने का प्रयास किया तो उसकी गुणवत्ता काफी खराब निकली। ग्रामीणों की मानें तो ये लइया खाने में अच्छा नहीं है और इतना ही नहीं खाने में यह गले में चिपक जाता है। इनका कहना है कि ये जैसे प्लास्टिक का बना है, न गलता है और न ही खाने में इसका स्वाद अच्छा लगता है। कुछ ग्रामीण महिलाओं का ये भी कहना है कि इंसान तो इंसान इसे पालतू जानवर और कुत्ते भी नहीं खा रहे हैं और इसको लोग नदी नाली या पानी में फेंक दे रहे हैं। पानी में पड़ते ही यह लइया रबर की तरह हो जा रहा है।

डी एम ने खराब राहत सामग्री को लेकर जारी किए निर्देश

शासन से हुई इस सहायता सामग्री के सप्लाई का काम लखनऊ की फर्म कुंवर इंफ़्रा डेब्लपर नाम की संस्था को मिला है। संस्था ने गुणवत्ताहीन लइया की आपूर्ति की है और जिले के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में केवल आलापुर तहसील क्षेत्र में लगभग 4 सौ पात्र परिवारों में बांटी गई है, जिसकी सच्चाई सामने आने के बाद जिला प्रशासन अब अपना दामन बचाने में जुट गया है और साथ ही सहायता सामग्री की आपूर्ति करने वाले फर्म के विरुद्ध जांच के बाद कार्रवाई करने की बात कह रहा है।

इस मामले पर डीएम का कहना है कि इस मामले की जानकारी मिली है, आलापुर एसडीएम को निर्देश दिए गए है कि वो ग्रामीणों को सूचित कर दें कि इस लइया का प्रयोग न करें और इसके साथ ही लइया की आपूर्ति करने वाली संस्था के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी, उसका भुगतान रोका जाएगा और आवश्यक हुआ तो केस भी दर्ज कराया जाएगा।

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