बड़ा खुलासा: हमारे पेट में हैं ऐसे बैक्टीरिया जिनसे बनेगी बिजली, इस छोटी तरकीब से होंगे कई फायदे

प्रोबायोटिक बैक्टीरिया बन सकते हैं 'लिविंग बैटरी'

Shweta Singh

September, 1411:59 AM

अमरीका

कैलिफोर्निया। एक इंसान के शरीर में कई ऐसे रहस्य छिपे हैं, जिनसे वैज्ञानिक समय-समय पर पर्दा उठाते रहते हैं। कुछ ऐसा ही हैरान कर देने वाला खुलासा हाल ही में अमरीका में हुआ है, जिसके मुताबिक हमारे पेट में मिलने वाले जीवाणुओं से भी बिजली बन सकती है। बात चौंकाने वाली है, लेकिन सच है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में एक शोध में पाया गया है कि लिस्टेरियोसिस बीमारी फैलाने वाला बैक्टीरिया ऑक्सीजन की कमी होने पर बिजली पैदा करने लगता है।

'लिस्टेरिया' नाम के बैक्टीरिया से होता है बिजली उत्पादन

लिस्टेरिया नामक यह बैक्टीरिया पेट में मौजूद खाने को प्रदूषित कर बीमारी फैलाता है। वैज्ञानिकों को शोध में हमारे पेट के अंदर बैक्टीरिया की ऐसी कई प्रजातियां मिली हैं जो बिजली पैदा करती हैं। एक फ्लास्क में इन जीवाणुओं के बीच इलेक्ट्रोड लगाने इनसे काफी परिमाण में बिजली का उत्पादन हो रहा था। वैज्ञानिक अब इसे परिष्कृत कर कचड़ा निष्पादन संयंत्र (वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट) या छोटे इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों को चलाने की विधि ढूंढ़ रहे हैं।

पहली बार हुआ ऐसा शोध: प्रोफेसर

शोध में शामिल प्रोफेसर डैन पोर्टनॉय ने इस बारे बात करते हुए बताया कि शरीर के अंदर मौजूद पैथोजेन (रोगाणु), प्रोबायोटिक बैक्टीरिया और कीटाणु को लेकर ऐसी खोज पहले नहीं हुई। आपतो बता दें कि यह शोध बुधवार को प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर' में छपी है।

ऐसे बनती है इनमें बिजली
बिजली पैदा करने की प्रक्रिया जीवाणुओं के उपापचय (मेटाबॉलिज्म) का हिस्सा है। मनुष्य की कोशिकाएं ऑक्सीजन का उपयोग ग्लूकोज और अन्य रूप में ऊर्जा पहुंचाने में करती हैं। लेकिन एक कोशीय (वन-शेल) वाले इन सूक्ष्म जीव में यह विकल्प नहीं होता। खदानों में पाए जाने वाले इलेक्ट्रोजीनिक जीवाणु लोहे या अन्य अयस्कों को ऑक्सीजन की तरह इस्तेमाल करते हैं। कोशिका के बाहरी हिस्से से अंदर पहुंचने की प्रक्रिया के दौरान बिजली के तरंग वाले इलेक्ट्रॉन बनते हैं।

इलेक्ट्रोजीनिक जीवाणुओं में होती हैं ये खूबियां

दरअसल बिजली पैदा करने वाले जीवाणुओं को इलेक्ट्रोजीनिक कहा जाता है। माना जाता था कि ऐसे जीवाणु सिर्फ एसिडिक माइन (एसिड वाले खान) या फिर झील की तलहटी में ही पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि इनसे करीब 500 माइक्रोएम्पीयर बिजली का उत्पादन होता है। इन जीवाणुओं में बिजली के तरंग स्वीकार करने वाले फ्लेविन नामक तत्त्व मिलते हैं। ये विटामिन बी-12 से बने होते हैं।

Shweta Singh
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