सावन कांवड़ यात्रा के दस नियम है, जिसे हर कांवड़िये को जानना और पालन करना जरूरी है तो कांवड़ यात्रा शुरू करने से पहले जान लेना चाहिए कांवड़ यात्रा नियम।
भगवान भोलेनाथ की विशेष पूजा का महीना शुरू है, इसी के साथ कांवड़ यात्रा भी शुरू होने वाली है। इसके तहत मार्ग के हिसाब से कांवड़िये निर्धारित स्थान से पवित्र नदी का जल भरते हैं और फिर किसी विशिष्ट शिवालय में जल ले जाकर सावन सोमवार या शिवरात्रि तिथि पर शिवजी का जलाभिषेक करते हैं।
देश में पांच प्रमुख कांवड़ मार्ग हैं, जिसमें शुरुआत के स्थान से कांवड़िये पवित्र जल भरते हैं और उसे ले जाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि कांवड़ यात्रा के दस नियम हैं, भगवान भोलेनाथ के आशीर्वाद के लिए जिसका पालन करना जरूरी होता है।
प्रयागराज के आचार्य प्रदीप पाण्डेय के अनुसार सावन में कांवड़ यात्रा करने की परंपरा है। लेकिन यह भक्तिपूर्ण कार्य है, इसलिए इस यात्रा में कोई शख्स शामिल हो रहा है तो भक्तिभाव से ही उसे कांवड़ निकालनी चाहिए।
इसके लिए कांवड़ यात्रा के सभी नियमों का पालन भी जरूरी है। कांवड़ियो को स्पष्ट होना चाहिए कि वह शिवजी की भक्ति के लिए यात्रा शुरू कर रहा है, न कि किसी जिज्ञासा या रोमांच के लिए। यात्रा में आने वाली परेशानियों के लिए भी कांवड़िये को तैयार रहना चाहिए।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कावड़ यात्रा के दौरान किसी भी तरह का नशा करना वर्जित है। इसलिए इस दौरान चरस, गांजा, शराब जैसे मादक पदार्थों से दूर रहना चाहिए वर्ना न यात्रा मान्य होती है और न ही शिव कृपा करते हैं।
कावड़ यात्रा एक तरह की तपस्या है। इसलिए कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िये को किसी भी तरह के मांसहारी भोजन की ओर अपना झुकाव नहीं दिखाना चाहिए। इस दौरान सिर्फ भगवान के ध्यान में ही मन को रमाना चाहिए।
कावड़ यात्रा के दौरान किसी भी सूरत में कांवड़ जमीन पर नहीं रखनी चाहिए। यदि कहीं पर रुकना हो या दैनिक क्रिया से निवृत्त होना हो तो कांवड़ को किसी पेड़ की ऊंची डाली पर लटका सकते हैं या किसी साथी कांवड़िये के कंधे पर रख सकते हैं। यदि भूलवश भी कांवड़ को भूमि पर रख दिया तो फिर से कावड़ में जल भरना होता है।
कांवड़ यात्रा के लिए एक प्रमुख शर्त है कि भोलेनाथ के अभिषेक के लिए इसमें पवित्र नदी का जल यानी बहता हुआ जल ही भरना चाहिए। इसमें कुएं या तालाब का जल नहीं भरना चाहिए।
कावड़ यात्रा पैदल ही पूरा करने का नियम है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कांवड़ यात्रा प्रारंभ करने से पूरा होने तक का सफर पैदल ही तय करते हैं। हालांकि इसके पूर्व और इसके बाद का सफर वाहन आदि से कर सकते हैं।
कांवड़ यात्रा के नियमों के अनुसार पहली बार यात्रा कर रहे हैं तो पहले वर्ष छोटी दूरी की यात्रा करनी चाहिए फिर क्षमता अनुसार बड़ी दूरी की यात्रा करनी चाहिए। ताकि कांवड़ यात्रा की तपस्या करने के योग्य शरीर को बनाया जा सके।
कावड़ियों को एक दूसरे की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए लाइन बनाकर ही चलना चाहिए। इसलिए जिस जत्थे के साथ कांवड़ यात्रा कर रहे हैं, उसके साथ ही रहना अच्छा है।
यात्रा की शुरुआत अपने शहर के करीब की किसी नदी से जल लेकर शहर या आसपास के प्रमुख शिवमंदिर तक की जाती है। इसके अलावा देश भर में पांच प्रमुख कांवड़ यात्रा मार्ग हैं जिसे कांवड़िये पूरा करते हैं।
1. नर्मदा से महाकाल तक
2. गंगाजी से नीलकंठ महादेव तक
3. गंगा से बैजनाथ धाम (बिहार) तक
4. गोदावरी से त्र्यम्बकेशवर तक
5. गंगाजी से केदारेश्वर तक
यात्रा के दौरान सेहत का ध्यान रखना जरूरी होता है। इसलिए अपनी क्षमता अनुसार ही यात्रा की दूरी निश्चत करें और इस दौरान खानपान पर विशेष ध्यान दें। रास्ते पीने के लिए शुद्ध जल का ही प्रयोग करें। उचित जगह रुककर आराम करें।
सामान्यतः कांवड़िये पवित्र नदी से जल भरकर अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध शिवालय पहुंचते हैं और सोमवार या शिवरात्रि के दिन जलाभिषेक करते हैं और समय से पहले लौट आते हैं तो घरों से दूर कांवड़ यात्री के नियमों का पालन करते हुए भगवान के ध्यान में रहते हुए समय बिताते हैं।
मान्यता है इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है और घर धन धान्य से भरा रहता है। इस यात्रा से अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है।