Cyber Fraud: गुजरात पुलिस ने म्यूल अकाउंट से जुड़े बड़े साइबर ठगी नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोपियों और उनके खातों से जुड़े देशभर में 982 साइबर फ्रॉड केस दर्ज हैं, जिनमें 231 करोड़ रुपए से ज्यादा की ठगी सामने आई है। जांच में राजस्थान के भीलवाड़ा और अजमेर कनेक्शन का खुलासा हुआ है, जबकि नेटवर्क के जरिए 631 करोड़ रुपए से अधिक के वित्तीय हेरफेर की बात सामने आई है।
Rajasthan Cyber Link: गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) गांधीनगर की टीम ने म्यूल अकाउंट से जुड़े बड़े साइबर ठगी नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। अहमदाबाद समेत गुजरात के कई शहरों में एक साथ दबिश देकर इन्हें पकड़ा गया।
पुलिस जांच में सामने आया है कि पकड़े गए आरोपियों और उनके म्यूल अकाउंट के खिलाफ देशभर में 982 साइबर ठगी के मामले दर्ज हैं। इन मामलों में 231 करोड़ रुपए से ज्यादा की साइबर ठगी की पुष्टि हुई है। वहीं जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपियों के नेटवर्क के जरिए देशभर में 631 करोड़ रुपए से अधिक का वित्तीय हेरफेर किया गया। गुजरात में ही ऐसे 77 मामले दर्ज होने का खुलासा हुआ है।
गिरफ्तार आरोपियों में राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के धनोप गांव के मूल निवासी और वर्तमान में अहमदाबाद व सूरत में रहने वाले मनीष लोढ़ा (39) और अंकित लोढ़ा (28) शामिल हैं। इसके अलावा अजमेर जिले के नसीराबाद क्षेत्र के बाघसूरी गांव के मूल निवासी और फिलहाल सूरत के उधना में रहने वाले नवीन वैष्णव को भी गिरफ्तार किया गया है।
आरोपियों में सूरत निवासी मोहित कुमार जैन (नाहर), नयन इटालिया, निमेष जेताणी और मोटा वराछा क्षेत्र का विमल जाड़ा भी शामिल हैं। इसके अलावा अलग-अलग स्थानों से अन्य आरोपियों को भी पकड़ा गया।
पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से 28 मोबाइल फोन, 39 चेकबुक, एक पासबुक, दो लैपटॉप, 12 डेबिट और एटीएम कार्ड तथा चार कंपनियों के स्टाम्प बरामद किए हैं।
जांच एजेंसियों का मानना है कि ये लोग संगठित तरीके से साइबर ठगों के लिए बैंक खाते उपलब्ध कराते थे, जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम को ट्रांसफर करने और छिपाने में किया जाता था।
म्यूल अकाउंट ऐसा बैंक खाता होता है, जिसका इस्तेमाल साइबर अपराधी गैरकानूनी तरीके से कमाए गए या ठगी के पैसों को छिपाने और ट्रांसफर करने के लिए करते हैं।
यह खाता आमतौर पर किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर होता है। साइबर ठग छात्रों, बेरोजगार युवाओं या आर्थिक रूप से जरूरतमंद लोगों को कमीशन और आसान कमाई का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाते हैं या पुराने खाते किराए पर ले लेते हैं।
इसके बाद साइबर ठगी की रकम इन्हीं खातों के जरिए इधर-उधर ट्रांसफर की जाती है, ताकि असली अपराधियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाए। हालांकि बैंक खाते का दुरुपयोग होने पर जांच एजेंसियों की नजर में खाताधारक भी आरोपी बन सकता है।
सीओई गांधीनगर की टीम अब पूरे नेटवर्क के फाइनेंशियल ट्रेल और अन्य राज्यों से जुड़े कनेक्शन की जांच कर रही है। पुलिस को शक है कि यह गिरोह लंबे समय से देशभर में सक्रिय था और कई साइबर ठगी गिरोहों को बैंकिंग सपोर्ट उपलब्ध करा रहा था।