समापन समारोह में जयपुर के महंत हरीशंकर दास वेदांती, दिल्ली के संत परिपूर्णानंद सरस्वती व बनारस के मंदिर प्रन्यासी आदित्य काबरा रहे उपस्थित
माउंट आबू . रघुनाथ मंदिर महंत डॉ. स्वामी सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्र्य ने कहा कि अनावश्यक इच्छाओं ने ही मनुष्य को दु:खी बना दिया है। जीवन का यह एक सहज क्रम है। सामान्यत: मानव में इच्छा व आकांक्षा की तरंगें उत्पन्न होती रहती हैं, लेकिन यह इच्छाएं मन-मस्तिष्क पर हावी न हों, इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। यह बात उन्होंने रघुनाथ मंदिर के 77वें पाटोत्सव के समापन अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि जहां इच्छाएं मनुष्य पर हावी हो जाती हैं वहां विवेक चेतनालुप्त हो जाता है। आवश्यकता व इच्छा दो अलग-अलग पहलू हैं, जिसका भेद समझना जरूरी है। आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है, लेकिन इच्छाओं की पूर्ति असंभव-सी है।
मंदिर अधिकारी डॉ. स्वामी राधाकृष्ण दास ने कहा कि भारतीय धर्म-दर्शन, धर्म शास्त्र के अनुरूप जीव, जीवन व जगत की वास्तविकता को जानने से शुद्ध चेतना का दीप प्रज्जवलित होने लगता है। ब्रह्माण्ड में रहने वाले परमात्मा की ऊर्जा का अनुभव करने के लिए स्वयं के निज स्वरूप को पहचानने व महसूस करने की साधना जरूरी है। दिल्ली से आए संत परिपूर्णानंद सरस्वती ने कहा कि परमात्मा सर्वज्ञ है, उसके लिए समस्त मानवप्राणी समान है। वह किसी की किस्मत नहीं बिगाड़ता है, लेकिन कर्मविधान के अनुसार जो जैसा करता है वैसा ही फल पाता है। जयपुर से आए महंत हरीशंकर दास वेदांती, बनारस से आए मंदिर प्रन्यासी आदित्य काबरा आदि ने भी विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर जगदीशचंद्र डाड, भारतसिंह राठौड़, देवीसिंह देवल, श्यामसुंदरदास, मंागीलाल काबरा, संजय विश्राम आदि श्रद्धालु उपस्थित थे। पाटोत्सव के समापन पर यज्ञ में आचार्य ऋषिकेश शर्मा, भूपनारायण मिश्रा की देखरेख में यजमानों से यज्ञ में आहुतियां दिलाई गई।