यहां अलग अलग परंपराओं में समुदाय के लोग मनाते हैं दीपावली

कहीं महालक्ष्मी की पूजन तो कहीं काली उपासना के साथ होता ईष्टदेवों का पूजा अर्चन

By: Rajan Kumar Gupta

Published: 15 Nov 2020, 07:32 PM IST

अनूपपुर। दीपो का त्योहार दीपावली हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिन्दू त्यौहार है। कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के बाद लौटे थे। अयोध्यावासियों ने राम के आगमन की खुशी में उनके स्वागत में घी के दीपक जलाए थे। कार्तिक मास की काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी थी, तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश पर्व हर्ष व उल्लास से मनाया जाता है। अनूपपुर जिले में भी निवासरत अलग अलग समुदाय के लोग अपनी पम्पराओं के साथ दीपावली का पर्व मनाते है। इनमें कुछ समुदाय दीपावली में महालक्ष्मी की पूजा अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करता है तो कुछ भद्रकाली की उपासना कर ईष्टदेवों की पूजा अर्चना करता है। कहीं दरवाजे पर केले के पेड़ों व आम के पत्तों की तोडऩ सजा महालक्ष्मी के स्वागत की तैयारी करते है तो कहंी दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा के रूप में परम्परागत वाद्ययंत्रों के साथ घर घर जाकर खुशी पूर्वक रीति रिवाज से खुशी मनाकर दीपावली का आनंद उठाते हैं।
बॉक्स: नवरात्रि अष्टमी स्वरूप भद्रकाली की होती है पूजा अर्चना
जयंतीदास गुप्ता बताती है कि बंगाल में दीपावली के मौके पर अन्य समुदायों की भांति लक्ष्मी पूजा नहीं किया जाता है। यहां के लोग रीति व परम्पराओं के अनुसार भद्रकाली(काली)की उपासना करते हैं। लक्ष्मी की पूजा शरद पूर्णिमा के दिन ही किया जाता है। जबकि दीपावली को नवरात्रि के महाअष्टमी स्वरूप की तरह मां काली की पूजा करते हैं। यहां बलि में अब फलों की बलि दी जाती है। शुभ मुहूर्त में पूजा का आयोजन करते हुए देर रात तक भद्रकाली की उपासना चलता है।
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बॉक्स: तिलक लगाकर आगंतुकों का होता है सत्कार, महिलाएं परम्परिक पोशाक में करती है पूजा अर्चना
मारवारी समाज में दीपावली मनाने के अलग परम्परा रही है। इनमें समाज द्वारा अपने कुलदेवी के रूप में महालक्ष्मी ही पूजा करते हैं। घर के बाहर केले के पेड़ व घर के मुख्य द्वार को आम के पत्तों के तोडऩ से सजाते हैं। महिलाएं पारंपरिक पोशाक में पूजा में शामिल होती है। जहां सर्वप्रथम गद्दी की पूजा की जाती है। इसके बाद महालक्ष्मी व गणेश की प्रतिमा को स्थापित कर हवन व अभिषेक किया जाता है। इस मौके पर घर आने वाले सभी आगतुकों को तिलक लगाकर सम्मान किया जाता है। जबकि गरीबों के बीच वस्त्र व मिठाई बांटने की परम्परा है।
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बॉक्स: लक्ष्मी को नए फलों का चढ़ाया जाता प्रसाद
दक्षिण भारतीय परम्पराओं के मनाने वाले जयंत राव व उनके परिवार के सदस्य दीपावली के मौके पर घर को रंगोली के साथ दीपों से सजा कर लक्ष्मी और गणेश की पूजा करते हैं। यहां पूजा में लक्ष्मी और गणेश को सीजन के दौरान बाजार में आने वाले नए फल, बतासा, स्वादिष्ट पकवान का भोग लगाते हैं। इनमें महिलाएं पारम्परिक पोशाक का उपयोग करती है।
बॉक्स: लक्ष्मी के साथ तुलसी की पूजा बाद घरों में जलता है दीपक
बिहार की परम्पराओं को मनाने वाले दीपावली के मौके पर मां लक्ष्मी के साथ गणेश, कुबेर की भी पूजा करते हैं। इसके बाद तुलसी का पूजन होता है। इन दोनों के पूजा के बाद ही घर के अंदर दीपों को संजाया जाता है। इससे पूर्व दीपावली के मौके पर घर के आंगन व बाहर के द्वार को गोबर से लिपने की परम्परा रही है। माना जाता है लक्ष्मी स्वरूप गाय के गोबर से लिपाई करने पर स्थल पवित्र हो जाता है और लक्ष्मी उनके घर अवश्य पधारती है।
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Rajan Kumar Gupta Desk
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