कोरोना संक्रमण के साए में गुजरता है हरेक पल, खुद के साथ परिवारवालों की भी चिंता

घर में खुद को किया आईसोलेट, मानव सेवा का एक और बेहतर मौका

अनूपपुर। कोरोना संक्रमण के कहर से सहमी और कोप भाजन बनती दुनिया के लिए वर्तमान में डॉक्टर, पुलिस, समाजसेवी, सफाईकर्मी भगवान के रूप में नजर आ रहे हैं। इनमें सबसे कर्तव्यनिष्ठ और देवता के श्रेणी में धरती के भगवान माने जाने वाले डॉक्टर आज भी संक्रमण के बीच खुद की जिंदगी की परवाह किए बगैर प्रभावित मरीजों की सेवा में रात दिन जुटे हैं। इनके साथ अपने परिवार और बच्चों को दरकिनार कर मरीजों की सेवा में पैरामेडिकल स्टाफ भी सराहनीय भूमिका निभा रहीं हैं। जहां उनके अस्पताल से निकलने के बाद हर नागरिक की निगाहें उनकी बहादुरी को सलाम करते हुए संक्रमण के भय से पैनिक बना नजर आता है। जिला अस्पताल में सेवानिवृत्ति(पुन: संविदा रूप में बहाल) मेडिकल ऑफिसर डॉ. एसआरपी द्विवेदी, जिन्होंने अपने जीवन का लगभग २५ साल चिकित्सा क्षेत्र में देकर मानव सेवा की है। राज्य शासन ने वर्तमान में उन्हें कोरोना संक्रमण मरीजों की सेवा के लिए जिला अस्पताल में नोडल अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी सौपी है। ६६ वर्षीय डॉ. एसआरपी द्विवेदी अपने परिवार के साथ रहते हैं। पुत्र और पुत्री की शादी हो चुकी है और बाहर रहते हैं। डॉ. द्विवेदी का कहना है कि कोरोना संक्रमण से जहां पूरी दुनिया भयभीत है, वह आज भी मरीजों के बीच सेवा देने में नहीं झिझक रहे हैं। चिकित्सा सेवा की माना जाय तो मानव सेवा का एक और बेहतर मौका उन्हें दिया गया है। लेकिन इसमें खुद की चिंता के साथ साथ परिवार के सदस्यों की भी चिंता लगी रहती है। सुबह जिला अस्पताल के लिए आना सैकड़ा मरीजों के बीच काम करना और पुन: घर जाना। जिसमें घर पहुंचते ही घर के सदस्यों की नजर असहमी सी नजर आती है। जिन्हें देखने के बाद खुद भी असहमा महसूस करता हूं। लेकिन डॅाक्टर होने के नाते यह मेरा कर्तव्य व जिम्मेदारी बनता है कि आम नागरिकों की सेवा प्रथम है। हां इसके लिए खुद को डाइट और नींद जैसी जरूरतों का ख्याल रखता हूं। साथ ही परिवार के सदस्यों से भी थोड़ी दूरी लेकर चलता हूं। कोरोना के भय के कारण नौकरों द्वारा भी दूरी बनाई जा रही है। जिसमें घर में थोड़ी परेशानी जरूर बनती है। लेकिन यह भी जीवन का एक हिस्सा है हंसकर टाल जाते हैं।
बॉक्स: बच्चों को घर में बंदकर आती है ड्यूटी निभाने
जिला अस्पताल में कोरोना के खतरो से बचाने कार्यरत स्टाफ नर्स इमला पटेल पति अनिल सिंह ने अब अपने दो छोटे बच्चे को घर के दरवाजे के पीछे बंद कर अब अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। जहां उनके बच्चों को देखने कोई नहीं है। सुबह ८ बजे से लेकर दोपहर २ बजे तक उनके बच्चे असुरक्षित अपने घर के चारदीवारी में बंद रहते हैं। इमला पटेल ने बताया कि उनके पति छत्तीसगढ़ में फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में कार्यरत है। जिसके कारण वे अपने दो बच्चों ५ वर्षीय पुत्र और ८ वर्षीय पुत्री के साथ किराए के मकान में रहती है। संक्रमण के खतरे के कारण फिलहाल वह अपने दोनों बच्चों को घर के अंदर कर मुख्य गेट पर ताला लगाकर जिला अस्पताल आ रही है। यहां कार्य करने के उपरांत खुद के साथ बच्चों की चिंता लगी रहती है। उनका कहना है कि मेरी थोड़ी से लापरवाही में दोनों बच्चों को खतरा हो सकता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वह न तो अपने पति को बुला सकते हैं और घरवालों को साथ रख सकते हैं। लेकिन दूसरी और असुरक्षित माहौल में बच्चों को भी छोडऩा समझदारी नहीं है। वहीं जिला अस्पताल में कार्यरत पैरामेडिकल स्टाफ नर्स प्रीति यादव अपने साल के बच्चे के साथ अस्पताल की जिम्मेदारियों को निभा रही है। प्रीति यादव के पति भी छत्तीसगढ़ में कोयला खदान में कार्यरत है। जहां जिला प्रशासन द्वारा लगाए गए लॉकडाउन और धारा १४४ के कारण पति की वापसी मुश्किल हो गई। प्रीति यादव का कहना है कि पूर्व में वह अपने बच्चे को लेकर जिला अस्पताल चली जाती थी, लेकिन अब कोरोना के भय से वह अपने बच्चों के प्रति गम्भीर बनी हुई है। प्रीति ने बताया कि उनके आवेदन पर अस्पताल प्रबंधक ने फिलहाल अवकाश दिया है। लेकिन आगे की समस्या बनी हुई, जहां लम्बी अवधि तक लगने वाले लॉकडाउन और अस्पताल की आने वाली डियूटी में पुन: खतरों के बीच अपने बच्चे के साथ जिला अस्पताल जाना होगा।
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Rajan Kumar Gupta Desk
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