दम तोड़ रही नर्मदा की सहायक नदियां, वनों की कटाई में पतली हुई नदियों की धार

साल वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से नर्मदा के जलस्त्रोत में कमी, सीएम ने पौधारोपण का किया आह्वान

By: Rajan Kumar Gupta

Updated: 23 Feb 2021, 11:40 AM IST

अनूपपुर। जिले की पवित्रनगरी अमरकंटक को नदियों का नगर कहा जाता है, माना जाता है कि पूर्व में यहां नर्मदा को छोडक़र २४ अन्य छोटी नदियां बहती थी, जो कहीं न कहीं नर्मदा में मिल जाया करती थी। इनमें १७ खुली जलस्त्रोत के रूप में बहती हुई और शेष गुप्त रूप में जमीन के नीचे से बहती मानी जाती है। लेकिन अमरकंटक में अब मुख्य रूप से नर्मदा, सोन, जोहिला जैसी मुख्य नदियों का उद्गम जल स्त्रोत नजर आता है। शेष नदियों में कुछ जलस्त्रोत के अभाव में विलुप्त हो गई तो कुछ गंदगी और संरक्षण के अभाव में अस्तित्व समाप्ति की बाट जोह रही है। जानकारों के अनुसार इसका मुख्य कारण सतपुड़ा और मैकल पहाडिय़ों के बीच बसे अमरकंटक क्षेत्र में साल वृक्षों की सर्वाधिक कटाई और जलस्त्रोत वाली पौधों की जगह यूको लिप्टस जैसे पौधों की उपज माना गया है। इसके अलावा पुष्पराजगढ़ के दमगढ़ से लेकर मंडला जिले तक सैकड़ों स्थलों पर रेत के अवैध खनन से नर्मदा अपने उद्स्थल पर ही दयनीय बन गई है। टीक, साल, चाड़ व आम के पेड़ो से घिरे वनों से सदा हरी-भरी रहने वाली अमरकंटक की सतपुड़ा-मैकाल पहाडिय़ों में अब वीरानापन आने लगा है। जिसके कारण खुद नर्मदा के लिए जलस्त्रोत का अभाव हो गया, वहीं वैतरणी, सोन, जोहिला जैसी नदियों की धार पतली हो गई। बताया जाता है कि सतपुड़ा और मैकल पहाडिय़ों के बीच नर्मदा का कछार क्षेत्र साल वृक्षों की घनघोर वनीय क्षेत्र से भरे पड़े थे, जिससे पेड़ों की जड़ों से सालभर पानी का बहाव बना रहता था, इसमें नर्मदा की जलधारा विस्तारित रूप में बहती थी। यहीं नहीं नर्मदा के दोनों छोर पर लम्बी लम्बी उंचाई के जंगली घास उगा करते थे, इनमें बाघ, तेंदुआ सहित अन्य जानवरों का बसेरा भी बना हुआ था। साल के वृक्ष बारिश के मौसम में वर्षा के पानी को अवशोषित करते थे और यहीं अवशोषित जल बूंद-बूंद रूप में रिसते हुए नर्मदा में मिलते थे। लेकिन अब साल के वृक्षों की कटाई के कारण कछार क्षेत्र वीरान हो गया है और तटों पर पक्के निर्माण हो गए हैं। जिसके कारण अब नर्मदा सहित उनकी सहायक नदियों को जलस्त्रोत का अभाव हो गया है।
बॉक्स: अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही वैतरणी
नर्मदा के सहयक नदियों में गायित्री, सावित्री, वैतरणी, कपिला आरंडी, बाराती सहित अन्य नदियां है। जिसमें गायित्री और सावित्री पर डैम बनाकर नर्मदा से जोड़ दिया गया है। जबकि वैतरणी नदी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वैतरणी नदी में नगर का दूषित पानी, कचरा और मलवा फेंका जा रहा है। जिसके कारण यह नदी अब मात्र नाम की रह गई है, जबकि जलधारा की जगह मलवा और दुर्गध शेष बच गया है।
बॉक्स: बारिश में भरती है उफान और गर्मी में हो जाती सकरी
वनों के अभाव में अब नर्मदा सहित अन्य सहायक नदियों में पानी का अभाव हो गया है, जिसके कारण मानसून के दौरान पहाड़ों से उतरने वाली बारिश का पानी नदियों में उतरकर उफान भरने लगता है। लेकिन चंद दिनों के बाद पानी बहकर मात्र सकरी नालों के रूप में बहने लगती है। पक्के निर्माण पर भी दिया व सिया सहित एनजीटी ने भी निर्देशों का कभी पालन नहीं किया।
बॉक्स: हरियाली योजना हो गई फेल
नर्मदा संरक्षण और अमरकंटक को हरियाली से जोडऩे शासन ने हरियाली योजना चलाई। करोड़ों खर्च कर करोड़ो पौधों का रोपण किया गया। लेकिन हालात यह है कि प्रशासकीय स्तर पर लगाए गए अधिकांश पौधे देख-रेख के अभाव में सूख गए। जिसे देखने फिर दोबारा शासन-प्रशासन नहीं पहुंची।
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Rajan Kumar Gupta Desk
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