कोरोना की मार में अब गांव ही बना सहारा, जमीन के छोटे से टुकड़े पर धान बोनी की तैयारी

खेती और मजदूरी को बनाया अपना हथियार

By: Rajan Kumar Gupta

Published: 29 Jun 2020, 06:01 AM IST

अनूपपुर। कोरोना महामारी के दौरान देशभर में जारी लॉकडाउन से बंद हुए उद्योगधंधों में बेरोजगार हुए मजदूरों के लिए अब उनका अपना गांव ही सहारा बन गया है। महानगरों से परेशानियों से जूझकर अपने देस लौटे ग्रामीण दीपावली से पूर्व कहीं बाहर रोजगार की तलाश में जाने को तैयार नहीं हैं। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में खुद के साथ परिवार के भरणपोषण में स्थानीय स्तर पर ही खेती और मजदूरों को अपना हथियार बना लिया है। पुष्पराजगढ़ विकासखंड के ग्राम भेजरी निवासी उत्तमलाल पिता लामूलाल हैदराबाद में बिस्किट फैक्ट्री में काम करता था, जहां 400 रूपए प्रतिदिन एवं एक टाइम खाना मिलता था। लेकिन करोना में काम बंद हो जाने पर घर वापस लौटने के लिए विवश हो गया। बहुत कठिन रास्तों से घर पहुंचा। गांव पहुंचने पर थोड़ा जमीन का टुकड़ा पर ही अब खेती-बाड़ी आरम्भ कर दिया है। वहीं घर की जरूरतों को पूरा करने दूसरे के खेत में मजदूरी भी कर रहा है। जहां 200 रूपए तक रोज मिल जाता है। जिससे परिवार चल रहा है। उत्तमलाल कहता है कि कोरोना के दौरान जो परिस्थितियांं बनी और परेशानियों का सामना किया उसे देखकर बाहर नहीं जाने का इरादा किया है। अब गांव में ही खेती और मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण करेंगे।
वहीं ग्राम दैखल निवासी अमरनाथ केवट पिता राधेलाल महाराष्ट्र में ब्रश फैक्ट्री में काम करता था। यहां अमरनाथ केवट को प्रतिदिन ३५० रूपए मजदूरी मिल जाया करता था। लेकिन महाराष्ट्र में कोरोना के फैले प्रकोप में वह किसी प्रकार अपने गांव दैखल आया। लेकिन यहां भी बेरोजगारी और खाने की समस्या बनने लगी। जिसे देखते हुए खुद की पड़ी जमीन पर फिर से खेती करने का इरादा बनाया। फिर बारिश आरम्भ के साथ हल चलाकर खेती किसानी आरम्भ की। अमरनाथ केवट बताया कि शुरूआती समय है थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन अब गांव ही उसका एकमात्र सहारा है। यहां महानगरों की तरह अधिक आय नहीं हो पाएगा, लेकिन कम में भी गुजारा हो जाएगा। धान की फसल अच्छी हुई तो परिवार का भरणपोषण आसानी से हो जाएगा। इसके अलावा गांव में रोजगार भी मिल जाएंगे।
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Rajan Kumar Gupta Desk
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