चिकित्सक ने खुद को किया आइसोलेट, अपने दो बच्चों को कमरे में बंदकर अस्पताल पहुंच रही स्टाफ नर्स

ड्यूटी ने परिवार से कर दिया अलग थलग, परिवार के सदस्यों की लगी रहती है चिंता

By: Rajan Kumar Gupta

Published: 05 Apr 2020, 06:02 AM IST

अनूपपुर। कोरोना संक्रमण के कहर से सहमी दुनिया के लिए वर्तमान में डॉक्टर, पुलिस, समाजसेवी, सफाईकर्मी भगवान के रूप में नजर आ रहे हैं। इनमें देवता के रूप में धरती के भगवान माने जाने वाले डॉक्टर आज इस संक्रमण के बीच खुद की जिंदगी की परवाह किए बगैर प्रभावित मरीजों की सेवा में रात दिन जुटे हैं। इस ड्यूटी ने उन्हें अपने परिवार से अलग थलग कर दिया है। जहां उनके अस्पताल से निकलने के बाद शहर का हरेक नागरिक उनकी बहादुरी को सलाम करते हुए संक्रमण के भय से खुद को असहजता में दूरी बना लेता है। जिला अस्पताल में सेवानिवृत्ति(पुन: संविदा रूप में बहाल) मेडिकल ऑफिसर डॉ. एसआरपी द्विवेदी मरीजों की लगातार जांच के बाद अब खतरा भापंते हुए आइसोलेट कर लिया है, वहीं दो बच्चों की मां स्टाफ नर्स भी दोनों बच्चों को कमरे में बंदकर अस्पताल की ड्यूटी निभाने पहुंच रही है। चिकित्सक डॉ. एसआरपी द्विवेदी ने बताया कि अपने जीवन का आधा से अधिक समय चिकित्सा क्षेत्र में देकर मानव सेवा की है। राज्य शासन ने वर्तमान में उन्हें कोरोना संक्रमण मरीजों की सेवा के लिए जिला अस्पताल में नोडल अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी सौपी है। ६६ वर्षीय डॉ. एसआरपी द्विवेदी अपने परिवार के साथ रहते हैं। पुत्र और पुत्री की शादी हो चुकी है और बाहर रहते हैं। डॉ. द्विवेदी का कहना है कि कोरोना संक्रमण से जहां पूरी दुनिया भयभीत है, वह आज भी मरीजों के बीच सेवा देने में नहीं झिझक रहे हैं। चिकित्सा सेवा की माना जाय तो मानव सेवा का एक और बेहतर मौका उन्हें दिया गया है। लेकिन इसमें खुद की चिंता के साथ साथ परिवार के सदस्यों की भी चिंता लगी रहती है। सुबह जिला अस्पताल के लिए आना सैकड़ा मरीजों के बीच काम करना और पुन: घर जाना। जिसमें घर पहुंचते ही घर के सदस्यों की नजर असहमी सी नजर आती है। जिन्हें देखने के बाद खुद भी असहमा महसूस करता हूं। खाने से लेकर रहने तक अलग हूं। डॅाक्टर होने के नाते यह मेरा कर्तव्य बनता है कि आम नागरिकों की सेवा प्रथम की जाए। हां इसके लिए खुद को डाइट और नींद जैसी जरूरतों का ख्याल रखता हूं। साथ ही परिवार के सदस्यों से भी थोड़ी दूरी बनाकर चलता हूं। इन परेशानियों पर यह भी जीवन का एक हिस्सा है हंसकर टाल जाते हैं।
वहीं जिला अस्पताल में कार्यरत स्टाफ नर्स इमला पटेल पति अनिल सिंह ने अब अपने दो छोटे बच्चे को घर के दरवाजे के पीछे बंद कर अब अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। जहां उनके बच्चों को देखने कोई नहीं है। सुबह ८ बजे से लेकर दोपहर २ बजे तक उनके बच्चे असुरक्षित अपने घर के चारदीवारी में बंद रहते हैं। इमला पटेल ने बताया कि उनके पति छत्तीसगढ़ में फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में कार्यरत है। जिसके कारण वे अपने दो बच्चों ५ वर्षीय पुत्र और ८ वर्षीय पुत्री के साथ किराए के मकान में रहती है। संक्रमण के खतरे के कारण फिलहाल वह अपने दोनों बच्चों को घर के अंदर कर मुख्य गेट पर ताला लगाकर जिला अस्पताल आ रही है। यहां कार्य करने के उपरांत खुद के साथ बच्चों की चिंता लगी रहती है। उनका कहना है कि मेरी थोड़ी से लापरवाही में दोनों बच्चों को खतरा हो सकता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वह न तो अपने पति को बुला सकते हैं और घरवालों को साथ रख सकते हैं। लेकिन दूसरी और असुरक्षित माहौल में बच्चों को भी छोडऩा समझदारी नहीं है।
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Rajan Kumar Gupta Desk
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