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जिला अस्पताल में नौनिहालों को कहां कराए माताएं फीडिंग, ब्रेस्ट फीडिंग कॉर्नर में मरीजों का हो रहा इलाज

विश्व स्तनपान सप्ताह: काउंसलिंग तक विभाग, प्रतिमाह अस्पताल में लगभग 300 नवजातों का होता है जन्म

अनूपपुर

Published: August 03, 2022 11:38:53 am

अनूपपुर। नौनिहाल अपनी मां के दूध से वंचित न हो और मां अपने बच्चों को सुरक्षित बे्रस्ट फीडिंग करा सकें इसके सार्वजनिक स्थलों पर भी ब्रेस्ट फीडिंग सेंटर बनाए गए हैं। जिला अस्पताल अनूपपुर सहित डिलेवरी सेंटर में काउंसलर रखे गए हैं, ताकि वे यहां आने वाले प्रसूताओं व माताओं को ब्रेस्ट फीडिंग सम्बंधित बेहतर जानकारियां प्रदान करते हुए अपने बच्चों को स्तन पान के माध्यम से स्वस्थ्य जिंदगी दे सके। लेकिन जिला अस्पताल में जच्चा-बच्चा के लिए बनाया किया कंगारू मदर केयर बेस्ट फीडिंग कॉर्नर में बच्चों की जगह प्रसूताओं का इलाज हो रहा है। यहां बच्चों को फीडिंग की जगह प्रसव उपरांत केयरिंग में रखी गई माताओं की देखभाल की जा रही है। जिसके कारण यहां शहरी या ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले माताएं अपने बच्चों को सुरक्षित स्थल की जगह असुरक्षित स्थानों पर ब्रेस्ट फीडिंग कराने को विवश है। बताया जाता है कि यह स्थिति पिछले कई माह से बनी हुई है। जिसे देखने वाला कोई जिम्मेदार नहीं है। जिसके कारण यहां प्रसूताओं को काउंसलर की ओर से मात्र काउंसलिंग ही कराई जा रही है। जबकि जिला अस्पताल में प्रतिमाह २७०-३०० नवजातों का जन्म होता है। काउंसलर नादिरा बानो का कहना है कि जब महिलाएं गर्भधारण के उपरांत जांच के लिए आती है तब से उन्हें पेट में पल रहे बच्चे की देखभाल, पौष्टिक आहार और साफ सफाई सम्बंधित जानकारी दी जाती है। साथ ही यह भी बताया जाता है कि उनके खान पान, साफ-सफाई पर ही उसके नौनिहाल का जीवन सुरक्षित रहता है। इसके अलावा जन्म के बाद बच्चे को अपना स्तन पान कराने, ६ माह तक बाहरी खान-पान और पानी से भी दूर रखने सम्बंधित जानकारी दी जाती है। हालंाकि ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को डेमों रूप में भी जानकारी देना आवश्यक होता है। क्योंकि वे अज्ञानता के अभाव में जन्म लेने वाले बच्चों को किस करवट, कैसे फीडिंग, कितनी उंचाई गर्दन, सहित दूध पिलाने के एंगल को बताना होता है। ताकि जन्म के बाद वे आसानी से अपने बच्चे का केयर कर सके। इसके लिए मार्मिक शब्दों का प्रयोग कर उसके पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक परेशानियों से भी अवगत होती हूं, और उसी के आधार पर उसका सहयोग कर स्वस्थ प्रसव कराया जाता है।
स्तन पान से मां और बच्चे दोनों का बेहतर रहता है स्वास्थ्य
काउंसलर नादिरा बानो बताती है कि मां का स्तन पान बच्चों के साथ मां के स्वास्थ्य को भी बेहतर रखने की एक प्रक्रिया है। प्रसव के सात दिनों तक मां के दूध में कोलेस्ट्रम एंजाइम निकलता है, जो बच्चे में रोग प्रतिरोधक क्षमता व आईक्यू विकसित करता है। प्रथम छह माह तक मां का दूध ही बच्चे के लिए सर्वाधिक सुपाच्य होता है। मां के दूध में एंटी एलर्जिक, एंटी बैक्टीरियल व ग्रोथ फैक्टर होते हैं जो बच्चे को बीमारियों से बचाते हैं। यहीं नहीं स्तनपान से माताओं को भी फायदा पहुंचता है। ब्रेस्ट व डिम्ब ग्रंथि के कैंसर की संभावनाओं को कम करता है, प्रसव के बाद शेप में आने में मदद करता है और मोटापे से बचाता है। प्रसव के बाद माताओं में होने वाली एनीमिया की शिकायत को कम करता है। खून के बनने की दर को बढ़ाता है।
सैकड़ा भर लीटर दूध और कई क्विंटलों लकडिय़ों की होती है बचत
सीएमएचओ डॉ. एससी राय बताते हैं कि महिलाओं को बताया जाता है कि मां के स्तन से निकलने वाला पहला पीलायुक्त गाढ़ा दूध नवजात के लिए कितना महत्वपूर्ण और उसके स्वास्थ्य के लिए कितना लाभकारी है। यहीं पीलायुक्त गाढ़ा दूध बच्चों को किन भयानक बीमारी से बचा सकता है। जब नवजात का जन्म होता है तो शुरूआती समय में वह ४-५ चम्मच दूध मां के स्तन से खींचता है। २४ घंटे के दौरान बच्चों के शारीरिक ढंाचा के अनुसार एक बच्चा रात के समय ४-५ बार फीडिंग करता है, जबकि दिन में ८-१० बार करता है। फिर जैसे जैसे शारीरिक विकास होता जाता है उसकी फीडिंग की मात्रा बढ़ती चली जाती है। और मां के स्तन ग्रंथियों से भी दूध की मात्रा अधिक बनती जाती है। बच्चा लगभग २ साल तक फीडिंग करता है, कुछ बच्चे ३ साल तक भी करते हैं। इस प्रकार अगर मात्राओं में देखा जाए तो ६ माह के दौरान लगभग सैकड़ाभर लीटर दूध सेवन करता है। अगर इसे बाहरी दूध मानकर इसे गर्म किया जाए तो इसमें भी क्विंटल लकडिय़ां भी खर्च मानी जा सकती है।
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