ध्वजारोहण के साथ हुआ सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ

ध्वजारोहण के साथ हुआ सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ
ध्वजारोहण के साथ हुआ सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ

Arvind jain | Updated: 06 Oct 2019, 11:04:51 AM (IST) Ashoknagar, Ashoknagar, Madhya Pradesh, India



-इन्द्र प्रतिष्ठा से किया गया प्रतिष्ठित नशीली वस्तुओं जमीकंद व फास्टफूड का कराया त्याग, सकलीकरण के साथ हुई मंडप शुद्धि, वेदी शुद्धि, भगवान को केवल ज्ञान होने पर कुबेर ने की रत्न जडि़त समवशरण की रचना

अशोकनगर. मुनिश्री प्रशांतसागरजी, मुनिश्री निर्वेगसागरजी व क्षुल्लकश्री देवानंद सागरजी महाराज के ससंघ सानिध्य में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ शनिवार को ध्वजारोहण के साथ किया गया। इससे पहले भगवान के केवलज्ञान होने पर कुबेर इंद्र ने रत्न जडि़त समवशरण की रचना की। ब्रह्मचारी संजीव भैया कटंगी द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ मंडल शुद्धि, वेदी शुद्धि सहित अन्य शुद्धि करवाईं तथा इंद्र इंद्राणियो को मुकुट, कंठावरण, हार, कुंडल, रत्न मुद्रिका आदि से प्रतिष्ठित करवाया।


उन्होंने बताया कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की महिमा अपरम्पार है। मैनासुंदरी के कोढ़़ी पति श्रीपाल का रोग इसी विधान की आराधना करने से दूर हुआ था। इस दौरान उन्होंने विधान में शामिल सभी लोगों को बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, जमीकंद, बाजार में बनी चीजें व फास्टफूड का त्याग करवाया। मंडल शुद्धि के दौरान देवताओं को आमंत्रित किया गया। सौधर्म इंद्र के आदेश के बाद कि भगवान को केवलज्ञान होने वाला है इसलिए कुबेर इंद्र ने रत्नों के समवशरण की अदभुत रचना की। इस दौरान तीस मंडल रत्नों के बनाए गए। सौधर्म इंद्र इंद्राणी ने मंडल पर कलश स्थापित किए। श्रीपाल मैनासुंदरी द्वारा अखंड दीपक स्थापित किया गया। इस दौरान चक्रवर्ती, बाहुबली, सौधर्म इंद्र, ईशान इंद्र, सानत इंद्र, माहेन्द्र इंद्र, कुबेर इंद्र, श्रीपाल मैनासुंदरी सहित अन्य प्रमुख पात्रों के साथ अन्य समस्त इंद्र इंद्राणियों ने भगवान की आराधना के साथ पहले दिन आठ अघ्र्य समर्पित किए गए।


हमारे भगवान दर्पण के समान है
मुनिश्री निर्वेगसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए बताया कि अपने प्रभु कैसे विचित्र है कि स्तुति करो तो प्रसन्न नहीं होते और निंदा करो तो भी दुख का कारण नही बनते। प्रभु तो दर्पण के समान है। दर्पण न रोता है और न हंसता है हम जैसे दर्पण के सामने जाएगें वैसा ही दिखेगा। हमारे संसार के दुखों का क्षय हो इसलिए स्तुति कर रहे है अनादिकाल से प्राणी चारों गतियों में भटकता हुआ सुुख चाह रहा है, लेकिन उसे सुख मिल नही रहा है। उन्होंने बताया कि आठ दिन तक सिद्ध प्रभु की आराधना करने का सौभाग्य मिला है यह अशुभ कर्म के क्षय का कारण बने। जितने हमारे जीवन में खान पान की शुद्धि होगी उतनी ही आचरण की शुद्धि होगी। संयमी बनकर आराधना करेगें तो हमारी अच्छ कार्यों की सिद्धि का कारण बनेगी।


मुनिश्री प्रशांतसागरजी महाराज ने बताया कि चक्रवर्ती समवशरण में जाकर तीर्थंकर भगवान की पूजा करता है उपदेश सुनता है। उन्होंने बताया कि मैनासुंदरी के पिता ने सही कर्तव्य नहीं किया उनका कर्तव्य था कि वह अपने बेटी का विवाह करें। दो बेटियां थी सुरसुंदरी विवाह के लिए तैयार हुई लेकिन मैनासुंदरी ने कहा कि मैं तो अपना भाग का खाती हूं इसी कारण उसका विवाह कोढ़ी से कर दिया गया। वह डाक्टर के पास जाते है लेकिन कहा जाता है कि जहां दवा काम नहीं करती वहां दुआ काम करती है। वह मुनि महाराज के पास जाती है और आठ दिन का सिद्धचक्र का विधान की आराधना कर अपने कोढ़ी पति का कोढ़ दूर करती है।

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