घास-फूस बेचकर परिवार का पेट पाल रहीं आदिवासी महिलाएं

घास-फूस बेचकर परिवार का पेट पाल रहीं आदिवासी महिलाएं

Arvind jain | Publish: Dec, 09 2018 08:26:08 AM (IST) Ashoknagar, Ashoknagar, Madhya Pradesh, India

चार दिन में एकत्रित करती हैं एक बोरी घमरा, फिर सुखाकर 60 किमी दूर बेचने जाती हैं महिलाएं।

अशोकनगर. शासन भले ही सब्जी के लिए आदिवासी परिवारों को हर माह एक हजार रुपए महीने देने का दावा कर रहा है, लेकिन हकीकत का अंदाजा फुटेरा गांव के आदिवासी परिवारों को देखकर लगाया जा सकता है। जहां महिलाएं खेतों और गहरी खाईयों से घमरा(घास-फूस) एकत्रित करती हैं, फिर उसे सुखाकर 60 किमी दूर बेचने के लिए जाती हैं और उन पैसों से वह अपने परिवार का पेट पाल रही हैं। जबकि शासन आदिवासी परिवारों के विकास के लिए दर्जनों योजनाएं चला रही है, लेकिन इन परिवारों को किसी भी योजना का लाभ नहीं मिलता।


हम बात कर रहे हैं जिला मुख्यालय से 15 किमी दूर स्थित फुटेरा गांव की। जहां की आदिवासी महिलाएं घमरा बेचकर परिवार का खर्चा चला रही हैं। जानकीबाई, मायाबाई, मोहरबाई, मुन्नीबाई और लक्ष्मी आदिवासी सहित करीब एक दर्जन महिलाएं हर सप्ताह घमरा बेचने के लिए 60 किमी दूर मुंगावली जाती हैं। उन्होंने बताया कि एक बोरी भरने में चार से पांच दिन लग जाते हैं, जिसे सुखाने के बाद वह ट्रेन से मुंगावली पहुंचती हैं।

15 रुपए किलो के हिसाब से उन्हें एक बोरी सामान के 150 से 200 रुपए मिलते हैं, जिसमें 50 रुपए किराए में खर्च हो जाते हैं। इससे सप्ताहभर में उन्हें 100 से 150 रुपए ही मिल पाते हैं और इस पैसे से वह परिवार का गुजारा करती हैं। यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि ज्यादातर गांव के आदिवासी परिवारों को इसी तरह से परिवार चलाना पड़ रहा है। लेकिन उनकी समस्या पर जहां विभाग तो ध्यान ही नहीं देता, वहीं प्रशासनिक अधिकारी भी गंभीरता नहीं दिखाते हैं।


झौंपड़ी में रह रहे, पीएम आवास भी नहीं मिले-
शासन की हर योजना के लिए आदिवासी परिवारों को पात्र माना जाता है, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के चलते योजनाओं का लाभ इन परिवारों तक नहीं पहुंच पाता है। हालत यह है कि यह आदिवासी परिवार आज भी घास-फूस की झौंपडिय़ों में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें पीएम आवास स्वीकृत नहीं हुए और न हीं पंचायत ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

महिला मुन्नीबाई और मायाबाई का कहना है कि सब्जी के लिए एक हजार रुपए महीने मिलने की जानकारी मिली थी, इससे कई बार कलेक्ट्रेट भी गए, लेकिन कोई उनके कागज लेने के लिए भी तैयार नहीं हुआ और अधिकारी उन्हें एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस तक दौड़ाते रहे। इससे कई दिन परेशान होने के बाद थक हार कर कलेक्ट्रेट जाना ही छोड़ दिया।


बड़ा सवाल: योजनाओं की फिर कैसी मॉनीटरिंग-
जिले में ज्यादातर आदिवासी परिवार ऐसे हैं, जो झौंपडिय़ों में रहते हैं और मजदूरी करके या घास-फूस बेचकर गुजारा कर रहे हैं। लेकिन ज्यादातर परिवारों के अब तक गरीबी रेखा की सूची में नाम तक नहीं जुड़े हैं। वहीं शासन की हर योजना के लिए इन परिवारों को पात्र माना जाता है। इसके बाद भी योजनाओं के लाभ से वंचित इन परिवारों से सवाल उठने लगे हैं कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी सरकारी योजनाओं की फिर कैसी मॉनीटरिंग कर रहे हैं।

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