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पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि की बेटी टैक्सी चलाने पर हुई मजबूर, कहा- सरकार ने नहीं ले रही सुध

locationनई दिल्लीPublished: Oct 19, 2018 08:55:51 pm

Submitted by:

Mohit Saxena

सरकार से मां को मिलने वाली पेंशन 2014 में बंद होने के बाद टैक्सी चलाकर घर का खर्च निकाल रहीं हैं

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पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि की बेटी टैक्सी चलाने पर हुई मजबूर, कहा- सरकार ने नहीं ले रही सुध

लाहौर। पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि हबीब जालिब की बेटी आजीविका के लिए टैक्सी चल रही हैं। पाकिस्तान में पंजाब प्रांत की सरकार से मां को मिलने वाली पेंशन 2014 में बंद किए जाने के बाद ताहिरा हबीब जालिब को टैक्सी चलाकर अपना घर चलाना पड़ रहा है। मीडिया के अनुसार रिपोर्ट के मुताबिक जालिब लाहौर के मुस्तफा टॉउन में रहती हैं और टैक्सी चलाकर किसी तरह परिवार का खर्च निकाल रही हैं। यह मामला उस समय सामने आया जब बीते बुधवार को लाहौर इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी ने ताहिरा को बिजली का 7,500 रुपये का बिल भेज दिया। पाक मीडिया के मुताबिक अपनी बहन और बच्चों के साथ रहने वालीं ताहिरा के अनुसार परिवार में वह इकलौता कमाने वाली है, उसे मजबूरी में टैक्सी चलानी पड़ रही है।
पिता ने मरते दम तक अपने वसूलों से कभी समझौता नहीं किया

उन्होंने बताया कि जो टैक्सी वह चलाती हैं। उसे लोन पर लिया गया है। ताहिरा कहती हैं कि हबीब जालिब की बेटी होने के बावजूद उन्हें टैक्सी चलाने में कोई शर्म नहीं आती है क्योंकि उनके पिता ने मरते दम तक अपने वसूलों से कभी समझौता नहीं किया। ताहिरा ने बताया कि उनकी मां को पहले 25 हजार रुपये का वजीफा मिलता था,जिसे पंजाब प्रांत की तत्कालीन शहबाज शरीफ सरकार ने 2014 में बंद कर दिया था। सरकार उनकी मां को यह वजीफा कवि कोटे के तहत देती थी। उन्होंने बताया कि उनकी मां के निधन से पहले ही सरकार ने यह पेंशन देना बंद कर दिया।
इंसान और इंसानियत के कवि थे

ताहिरा ने अपनी माली हालत बताते हुए सरकार से गुजारिश की कि वह पेंशन फिर से शुरू करे। बता दें कि हबीब जालिब इंसान और इंसानियत के कवि थे। उनका तेवर खालिस इंक़लाबी था। हबीब जालिब को तो हुक्मरानों को कई बार अपनी लेेखनी के कारण जेल भी जाना पड़ा। हबीब जालिब का जन्म 24 मार्च 1928 को पंजाब के होशियारपुर में हुआ था। भारत के बंटवारे को हबीब जालिब नहीं मानते थे। लेकिन घर वालों की मोहब्बत में इन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा। हबीब तरक्की पसंद कवि थे। इनकी सीधी-सपाट बातें ज़ुल्म करने वालों के मुंह पर तमाचा थीं। विभाजन के बाद हबीब जालिब पाकिस्तान चले गए थे और एक उर्दू अखबार में काम करते थे। बाद के दिनों में तरक्की पसंद कवि हबीब जालिब पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह जनरल अयूब खान के खिलाफ मजबूत आवाज के रूप में जाने गए।
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