आस्था ने तोड़ी भेदभाव की दीवारें, यहां मुस्लिम महिलाएं भी कर रही हैं छठ पूजा

एक यही व्रत है जिसमें अस्ताचलगामी सूर्य को अ‌र्घ्य दिया जाता है। इस महान पर्व में लोग अपनी सुरक्षा के साथ-साथ दूसरों की भी सुरक्षा करते हैं।

आस्था का महान पर्व छठ कई आस्थाओं का संगम है। तभी तो इस पर्व की महत्ता इतनी है कि इसे करने के लिए धर्म की दीवार भी इस पर्व के आगे बौनी साबित होती है। बिहार में इन दिनों चल रही छठ पूजा की धूम के बीच कई ऐसी मुस्लिम महिलाएं हैं, जिनका इस पर्व के प्रति गहरी आस्था है। 




मन्नत पर तबीयत ठीक हुई तो करने लगी व्रत 

सिवान स्थित बसंतपुर के बैजू बरहोगा पंचायत के बरहोगा निवासी चांद महम्मद मियां की पत्नी कुरैशा बेगम कहती हैं कि करीब ग्यारह साल पहले मेरी तबीयत लाख इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो रही थी। इसपर पड़ोसी हिंदू बहनों की परामर्श पर मैंने छठ पूजा के दौरान उनके साथ मन्नत मांगा कि अगर मेरी तबीयत ठीक हो जाती है तो मैं इस पर्व पर व्रत करूंगी। जिसके बाद मैंने इस पर्व पर व्रत रखना शुरू कर दिया। 





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इसका नतीजा है कि पिछले ग्यारह साल कैसे निकल गए मुझे पता ही नहीं चला। व्रत करते ही पति-बच्चे की तबीयत ठीक हो गई इसी गांव के हाकिम मियां की पत्नी जीनत बेगम ने बताया कि पति की बीमारी ठीक नहीं हो रही थी। मैंने फैसला किया कि छठ व्रत करूंगी और व्रत करना शुरू कर दिया और पति ठीक हो गए। मैं 15 वर्षों से इस व्रत को कर रही हूं। 




दूसरी तरफ सेरिया गांव के कोरानद्दीन मियां की पत्नी चांद तारा खातून का कहना है कि मेरे बच्चे की तबीयत खराब थी। मन्नत मांगी बच्चा ठीक हो गया और मैं 5 वर्षों से इस व्रत को कर रही हूं। 




100 साल की हादिशन बीबी ने 50 साल किया छठ व्रत 

बैजू बरहोगा की सौ वर्षीया हादिशन बीबी ने बताया कि मैं 50 वर्षों तक लगातार इस व्रत को करती आ रही थीं लेकिन अब स्वास्थ्य साथ नहीं देता इस उम्र में अब नहीं हो सकता। 15 वर्षों से यह व्रत नहीं कर पा रही हूं। 





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अपनी मर्यादा को ले महान छठ पर्व हर युग में अपनी महत्ता को बरकरार रखा है तथा व्रती कठिन से कठिन उपलब्धियों को हासिल किया है। एक यही व्रत है जिसमें अस्ताचलगामी सूर्य को अ‌र्घ्य दिया जाता है। इस महान पर्व में लोग अपनी सुरक्षा के साथ-साथ दूसरों की भी सुरक्षा करते हैं। छठ के उच्चारण मात्र से श्रद्धा उमड़ जाती है।




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