Pradosh Vrat 2021: प्रदोष काल में इस विधि से करें शिवजी की पूजा, जीवन में मिलेगी सफलता

त्रयोदशी तिथि भगवान शिव को समर्पित होती है।
शिव शंकर की पूजा से संतान, धन, सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
भगवान शिव की पूजा-अर्चना व व्रत रखने से सुख-सौभाग्य और समृद्धि आती है।

By: Shaitan Prajapat

Published: 24 Feb 2021, 10:47 AM IST

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में हर एक व्रत और त्योहार का खास महत्व होता है। इसी प्रकार प्रदोष व्रत का भी विशेष महत्व है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, आज बुधवार को माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि है। बुधवार के दिन त्रयोदशी की तिथि पड़ने के कारण इसे बुध प्रदोष व्रत भी कहा जाता है। यह तिथि भगवान शिव को समर्पित होती है। आज के दिन विधि-विधान के साथ शिव शंकर की पूजा की जाती है। उनकी कृपा से संतान, धन, सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना व व्रत रखने से सुख-सौभाग्य और समृद्धि आती है। इसके अलावा कुंडली में बुध और चंद्रमा की स्थिति बेहतर होती है।


प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त
— माघ शुक्ल त्रयोदशी, 24 फरवरी 2021, बुधवार।
— त्रयोदशी तिथि प्रारंभ- 24 फरवरी, बुधवार को शाम 06 बजकर 05 मिनट से।
— त्रयोदशी तिथि समाप्त- 25 फरवरी, गुरुवार को शाम 05 बजकर 18 मिनट पर।

प्रदोष व्रत का महत्व
ऐसी मान्यता है कि प्रदोष व्रत को जो व्यक्ति करता है उसे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। त्रयोदशी तिथि में भगवान शिव काफी प्रसन्न मुद्रा में होते हैं। प्रदोष व्रत के दौरान मान्यता है कि इस दिन शाम के समय भोलेशंकर कैलाश पर्वत पर अपने रजत भवन में नृत्य करते हैं। प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा विधि-विधान के साथ की जाती है। इस दिन शिवजी के मंत्रों का जाप किया जाता है। इस दिन व्रत करने से शिव जी की कृपा हमेशा भक्तों पर बनी रहती है। साथ ही व्रती के सभी दुख भी समाप्त हो जाते हैं। प्रदोष व्रत के दिन प्रदोष काल में भगवान शिव की विधि विधान से पूजा की जाती है। उनकी कृपा से संतान, धन, सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

 

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भगवान गणेश जी का मिलता है आर्शीवाद
बुधवार के दिन प्रदोष व्रत होने के कारण इस दिन की जाने वाली पूजा से भगवान गणेश जी को भी प्रसन्न किया जाता है। गणेश जी शिव परिवार के ही सदस्य है। गणेश जी का संबंध ज्ञान और बुद्धि से है। वहीं बुध ग्रह की अशुभता को दूर करने में भी यह व्रत उत्तम माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि यह व्रत सबसे पहले चंद्रदेव ने किया था। यह व्रत करने से चंद्रदेव पर भोलेनाथ की कृपा हुई और वह क्षय रोग से मुक्त हो गए।

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