इस राजा की लवस्टोरी से मचा हंगामा, माशूका के साथ कहा दुनिया को अलविदा

गुणीजन खाने की नृत्यांगना रसकपूर को प्रेयसी बनाकर महाराजा जगतसिंह ने रियासत में तूफान ला दिया था।

गुणीजन खाने की नृत्यांगना रसकपूर को प्रेयसी बनाकर महाराजा जगतसिंह ने रियासत में तूफान ला दिया था।  प्रसिद्ध हवामहल निर्माता प्रतापसिंह की मृत्यु के बाद जयपुर के राजा बने उनके पुत्र जगतसिंह पर रसकपूर का जादू इस कदर छाया कि राजकाज भूलकर उसके साथ रहने लगे।

रसकपूर जौहरी बाजार में वर्तमान फल मंडी स्थित कांच का दरवाजा भवन में रहती थी। गुणीजन खाने की पारो बेगम से रसकपूर ने नृत्य व गायन सीखा, इसके बाद वह दरबार की संगीत महफिलों में जाने लगी। जगतसिंह ने रसकपूर को महफिल में पहली बार देखा और वे उसकी अनुपम सुंदरता पर मोहित हो गए।

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एक समय एेसा आया जब रसकपूर जो कहती, वही रियासत में होता। वह महाराजा के साथ सिंहासन पर दरबार में बैठने लगी और उसे सामंतों की जागीरी के फैसले करने का अधिकार मिल गया। उसके लिए चंद्रमहल से सटा रस विलास महल भी बनवा दिया। अपने जन्म दिन पर शाही दरबार में जगतसिंह ने रसकपूर को जयपुर का आधा राज देने के साथ पोथीखाना व सूरतखाना दे दिया।

महाराजा ने लोकनिंदा की परवाह नहीं की और प्रेयसी को अपने साथ हाथी के होदे पर बिठाकर नगर में फाग खेलने निकल गए। इससे रनिवास व सामंत सुलग उठे और रसकपूर को महाराजा के दिल से उतारने की योजना बनाने लगे। सामंत चांद सिंह दूणी के अलावा मेघ सिंह डिग्गी, बैरिसाल सिंह सामोद, किशन सिंह चौमूं और वाटिका के स्वरुप सिंह आदि ने महाराजा की खिलाफत का बिगुल बजा दिया।

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इस राग-रंग से शासन की नींव हिलती देख  दौलतराव सिंधिया और अमीर खान पिंडारी जैसे दुश्मनों ने सिर उठा लिया। सिंधिया और अमीर खां को मोटी रकम देकर शांत करने में खजाना खाली होने लगा। मेवाड़ महाराणा भीम सिंह की राजकुमारी कृष्णा कुमारी से सगाई के लिए चार हजार सैनिकों के साथ भेजे टीके को जोधपुर की सेना ने रोक दिया, तब किशनगढ़ महाराजा के हस्तक्षेप के बाद सेनाएं लौटी।

बाद में जगतसिंह ने जोधपुर पर हमला कर घेरा डाल दिया। इसी बीच, अमीर खां पिंडारी  ने झोटवाड़ा से गोलियां बसराना शुरू कर दिया, तब जगतसिंह जयपुर आए। सामंतों ने कई तरह के आरोप लगा रसकूपर को नाहरगढ़ किले में कैद करवा दिया।

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इतिहासकार आनंद शर्मा के मुताबिक वर्ष 1818 में अंग्रेजों से संधि के बाद जगतसिंह को दुश्मनों से कुछ राहत मिलने लगी थी तब राजमहल के शत्रुओं ने षड्यंत्र रचकर जगतसिंह की हत्या करवा दी। रसकपूर उपन्यास में लिखा कि जगतसिंह की मृत्यु पर अंतिम दर्शन के लिए रसकपूर वेश बदल कर नाहरगढ़ किले से निकल भागी और गैटोर श्मशान में जगतसिंह की धधकती चिता में कूद गई।

- जितेंद्र सिंह शेखावत -

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