मंदिर के चारों ओर क्यों की जाती है परिक्रमा, इन बातों का रखें खास ध्यान वरर्ना ..

मंदिरों में दर्शन-पूजन के बाद भगवान की प्रतिमा के चारों ओर परिक्रमा करने की परंपरा है।
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, परिक्रमा करने से सकारात्मक ऊर्जा शरीर में प्रवेश करती है।
मंदिर में हमेशा परिक्रमा घड़ी की सुई की दिशा में करनी चाहिए।

By: Shaitan Prajapat

Published: 20 Feb 2021, 09:26 AM IST

नई दिल्ली। हिन्दू धर्म में परिक्रमा का बड़ा महत्त्व है। मंदिरों में दर्शन-पूजन के बाद भगवान की प्रतिमा के चारों ओर परिक्रमा करने की परंपरा है। वैदिक काल से ही इससे व्यक्ति, देवमूर्ति, पवित्र स्थानों को प्रभावित करने या सम्मान प्रदर्शन का कार्य समझा जाता रहा है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, मंदिर और भगवान के आसपास परिक्रमा करने से सकारात्मक ऊर्जा शरीर में प्रवेश करती है। मंदिर में हमेशा परिक्रमा घड़ी की सुई की दिशा में करनी चाहिए। इससे भी समझ सकते हैं कि आपको हमेशा भगवान के दाएं हाथ की तरफ से परिक्रमा शुरू करनी चाहिए। इससे न सिर्फ उस व्यक्ति के जीवन में शुभता आती है बल्कि वह सकारात्मक ऊर्जा उसके साथ ही उस व्यक्ति के घर में भी प्रवेश करती है जिससे घर में सुख-शांति आती है।

इस दिशा में परिक्रमा लगानी चाहिए
इस संबंध में धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान की परिक्रमा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और इससे हमारे पाप नष्ट होते हैं। सभी देवताओं की परिक्रमा के संबंध में अलग-अलग नियम बताए गए हैं। आपको घड़ी की सुई की दिशा में नंगे पांव परिक्रमा लगानी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि अगर परिक्रमा करते वक्त आपके कपड़े गीले हों तो इससे आपको और अधिक लाभ हो सकता है। कई मंदिरों में आपने लोगों को जलकुंड में स्नान करने के बाद गीले कपड़ों में ही मंदिर की परिक्रमा करते देखा होगा। इसका कारण ये है कि ऐसा करने से उस पवित्र स्थान की ऊर्जा को अच्छे तरीके से ग्रहण किया जा सकता है।

 

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पौराणिक कथा
परिक्रमा के संबंध में एक पौराणिक कथा भी है। कहते हैं कि जब गणेश और कार्तिकेयजी के बीच यह प्रश्न उठा कि दोनों में से श्रेष्ठ कौन है, तो वे कार्तिकेय संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करने निकले और गणेशजी ने वहीं माता पार्वती और भगवान शिव की परिक्रमा कर ली। प्रतियोगिता में गणेशजी विजयी हुए। भगवान की परिक्रमा करने मात्र से संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा, तीर्थों का फल मिल जाता है। इसलिए मंदिर में भगवान के दर्शन-पूजन के साथ ही परिक्रमा करने का भी विधान है।

किन बातों का रखें खास ध्यान...
— परिक्रमा के दौरान मन में शुभ भावों पर ही मनन करना चाहिए।
— बहुत तेजी से या बहुत धीमी गति से परिक्रमा नहीं करनी चाहिए।
— परिक्रमा पथ में सांसारिक विषयों से संबंधित बातें नहीं करनी चाहिए।
— पथ में पीछे की ओर लौटना, हंसी-मजाक करना या उच्च स्वर में नहीं बोलना चाहिए।
— परिक्रमा के दौरान अपने इष्ट देव के मंत्र का जाप करने से उसका शुभ फल मिलता है।
— हर परिक्रमा के बाद देव प्रतिमा को प्रणाम करें।
— परिक्रमा के बाद भगवान को पीठ नहीं दिखानी चाहिए।

किसकी कितनी बार परिक्रमा....
— आदि शक्ति के किसी भी स्वरूप की, मां दुर्गा, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, मां पार्वती, इत्यादि किसी भी रूप की परिक्रमा केवल एक ही बार की जानी चाहिए।
— भगवान विष्णु एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए।
— गणेशजी और हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है।
— शिवजी की आधी परिक्रमा करनी चाहिए, क्योंकि शिवजी के अभिषेक की धारा को लांघना अशुभ माना जाता है।

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