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राम मंदिर के गर्भगृह में लगेगी श्री रामलला की बड़ी मूर्ति, माता सीता गणेश, शबरी निषाद व जटायु भी होंगे विराजमान

राम जन्मभूमि परिसर में राम मंदिर के चारों दिशा में बनेगा माता सीता, गणेश, माता शबरी, निषाद राज, व जटायु का मंदिर

अयोध्या

Updated: April 19, 2022 08:08:44 pm

अयोध्या. राम जन्मभूमि परिसर में राम मंदिर के साथ प्रधान देवता के रूप में गणपति , माता सीता, महर्षि वाल्मीकि, माता शबरी, निषाद राज व जटायु का भी मंदिर बनेगा। दरसल राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक में यह निर्णय लिया गया है। इसके साथ ही मंदिर के गर्भगृह में 70 वर्षों जिस मूर्ति का पूजन समाज कर रहा उसे सिर्फ उत्सव के रूप में विराजित किया जाएगा यानी कि अब गर्भगृह में बाल स्वरूप में बड़ी प्रतिमा का प्राण प्रतिष्ठा कराया जाएगा।
राम मंदिर के गर्भगृह में लगेगी श्री रामलला की बड़ी मूर्ति, माता सीता गणेश, शबरी निषाद व जटायु भी होंगे विराजमान
राम मंदिर के गर्भगृह में लगेगी श्री रामलला की बड़ी मूर्ति, माता सीता गणेश, शबरी निषाद व जटायु भी होंगे विराजमान
रामलला की दूसरी मूर्ति पर संतों का होगा मत

राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की तिमाही बैठक में आज 14 ट्रस्टी अलग अलग रूप से जुटे रहे। लेकिन ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास की तबियत सही न होने के कारण इन बैठक में नही जुड़ सके। इस दौरान राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चम्पतराय ने जानकारी दी है कि आज की इस बैठक में यह भी विचार हुआ है कि श्री रामलला की मूर्ति कैसी होगी। जिसके लिए स्थानीय संतों से विचार करने की राय बनी है। भगवान श्री रामलला की मूर्ति बाल रूप में ही बनेंगी। यह मूर्ति सफेद रंग व काले रंग का हो या मुक्तिनाथ ग्रे रंग का सालिग्राम हो। यह भी आज इस बैठक में चर्चा का विषय था।
गर्भगृह में भगवान श्री रामलला के 2 प्रतिमा होंगी स्थापित

वहीं कहा कि 1949 में प्राकट्य हुए श्री रामलला की मूर्ति गर्भगृह की स्थाई प्रतिमा के रूप में नही होंगे विराजित ट्रस्ट के महासचिव ने जानकारी देते हुए कहा कि मंदिर का संचालन करने वाले सभी लोग जानते हैं कि मंदिर में एक प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति होती है। वह अचल मूर्ति होती है। जो कि एक स्थान पे स्थिर होती है। उसे हटाया नही जा सकता है। वह आकृति में बड़ी भी होती है। और दूसरी चल प्रतिमा होती है। उन्हें उत्सव मूर्ति भी कह सकते हैं। जो किसी पूजा उत्सव में उस मूर्ति को गर्भगृह से बाहर निकल सकते हैं। इसलिए 70 वर्ष से जिस विग्रह का समाज पूजन कर रहा है। वह उत्सव उत्सव मूर्ति का रूप ग्रहण करेगा।

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