घर-घर जन्मे रामलला, रामनवमी पर मंदिरों के प्रांगण रहे सूने, सोने का मुकुट और नई पोशाक पहनाकर शुरू की पूजा

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- रामलला को पहनाया गया सोने का मुकुट, मिली नई पोशाक, नींव के लिए हुई विशेष पूजा

By: Karishma Lalwani

Published: 21 Apr 2021, 04:59 PM IST

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

अयोध्या. रामनवमी पर लगातार दूसरे वर्ष भी मंदिरों के प्रगाण सूने रहे। पिछले वर्ष पांच अगस्त को जब पीएम मोदी ने भव्य राम मंदिर का शिलान्यास किया था तो लगा था रामनवमी पर इस वर्ष आकर्षक माहौल होगा। लेकिन कोरोना के ग्रहण के कारण ऐसा कुछ नहीं हुआ। रामनवमी के पर्व पर शहर में सन्नाटा पसरा रहा। कोरोना के मद्देनजर लोगों ने अपने-अपने घरों में ही त्योहार मनाया। जिला प्रशासन ने भी त्योहार के अवसर पर लोगों के बाहर निकलने को लेकर पाबंदी लगा दी। हनुमान गढ़ी और कनक भवन जैसे बड़े मंदिरों के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद रहे। केवल पुजारियों ने ही मंदिरों में पूजा की। 500 वर्षों बाद पहली बार राम जन्मभूमि में विराजमान रामलला जन्मोत्सव पर सोने का मुकुट को पहनाया गया।

रामलला को पहनाया गया सोने का मुकुट, मिली नई पोशाक

भगवान श्रीराम का जन्म कर्क लग्न में दोपहर 12 बजे हुआ था, तभी से भगवान राम का जन्मोत्सव चैत्र की नवमी तिथि को दोपहर 12 बजे मनाया जाता है। बुधवार को राम जन्मभूमि के अवसर पर श्रीराम को सोने का मुकुट पहनाया गया। श्रीराम के साथ ही उनके भाइयों को भी सोने का मुकुट पहनाया गया। आकर्षक व डिजाइनर परिधान में चारों भाइयों की मूर्ति को सोने का मुकुट पहना कर सजाया गया। जबकि 1992 से लेकर अबतक रामलला को चांदी के मुकुट में सोने की पॉलिश का मुकुट पहनाया जाता था। राम जन्मोत्सव पर्व पर प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में अयोध्या में रामलला सहित सभी विग्रह को वैदिक मंत्रोंचारण के साथ उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य (Keshav Prasad Maurya) की ओर से समर्पित नई पोशाक पहनाई गई।

मुकुट धारण के बाद वैदिक प्रक्रिया पूरी

आचार्य सतेंद्र दास ने कहा कि श्रीराम व उनके भाइयों को नए वस्त्र नए वस्त्र पहनाकर सोने का मुकुट धारण किया गया। इसके बाद जन्म की अन्य वैदिक प्रक्रिया की गई। आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि कोरोना संकट की घड़ी में भी रामलला का जन्मोत्सव वैसे ही मनाया गया। जैसे पहले मनाते रहे हैं। पूजा अर्चना, भोग में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। राम जन्मोत्सव में भगवान राम को तीन तरह की पंजीरी का प्रसाद भोग लगाया जाता है। पंचामृत से रामलला का स्नान कराया जाता है। इत्र का लेप भगवान के बाल रूप विग्रह पर लाया गया, फिर भगवान को नवीन वस्त्र धारण कराया गया। वहीं, प्रसाद के रूप में बाद पेड़ा, फल, फलाहारी पकौड़ी से भगवान का भोग लगाया।

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