आजमगढ़ का भोजपुरी से है गहरा नाता

आजमगढ़ का भोजपुरी से है गहरा नाता

Sujeet Verma | Publish: Jan, 21 2016 08:09:00 AM (IST) Azamgarh, Uttar Pradesh, India

यह नाथ सिद्ध और जैन कवियों की धार्मिक कविताओं में स्थल-स्थल पर प्राप्त भोजपुरी शब्दों से प्रमाणित है।

आजमगढ. जिले का भोजपुरी से गहरा नाता रहा है। पुराकाल में जब आजमगढ़ जंगलों, नदियों, नालों का आदिवासी गांव था, तब यहां के लोग अपभ्रंस की उस धारा में बोलते बतियाते थे जिसे मागधी अपभ्रंश कहा जाता है। यह नाथ सिद्ध और जैन कवियों की धार्मिक कविताओं में स्थल-स्थल पर प्राप्त भोजपुरी शब्दों से प्रमाणित है।

मसलन गुरु गोरखनाथ की रचना- हंसिबा खेलबा गईबा गीत..... ग्यारहवीं शदी से सोलहवीं तक वह अपभ्रंशिया भोजपुरी अवश्य ही स्थान केन्द्रित और निजी रही होगी जिसमें भोजपुरी के कई शेड्स मिले रहे होंगे। उदाहरणार्थ आजमगढ़ के दक्षिण काशी की अवधी-ठस्से की भोजपुरी तथा उत्तर में गोरखबानी का प्रचलन था। इससे आजमगढ़ की भोजपुरी इन दोनों से भिन्न आजमगढिय़ा भोजपुरी हो गई।

ऐसा सोलहवीं शताब्दी तक रूपान्तरण हो चुका था। इसे हम कबीर की भोजपुरी काव्य सर्जना में देख सकते हैं। मान्यताओं और गजेटियर के अनुसार कबीर का जन्म आजमगढ़ के बेलहरा गांव में जुलाहों की बस्ती में हुआ था। इस अचंल में आज भी जुलाहा बस्ती प्रमुख हैं मऊ, मुबारकपुर, चिरैयाकोट भुड़कुड़ा के उदासीन संत संप्रदाय के कवियों भीखा साहब, पलटू साहब और गोविन्द साहब ने अपने कई पद भोजपुरी में रचे।

वरिष्ठ भोजपुरी कवि राम प्रसाद शुक्ल निर्मोही बताते हैं कि  कबीर के बाद मुगलकाल में यह लोकभाषा उपेक्षा की शिकार हो गई। संस्कृत साहित्य में अशिक्षित  सेवक, आदिवासी और गंवार देशज भाषा का प्रयोग करते थे। उसी की देखा देखी भोजपुरी को भी गंवारू भाषा कहकर उपेक्षित कर दिया गया फलत: इसका इतिहास वाचिक ही रहा। केशव कहते थे कि उसके कुल के दास भी गंवारू भाषा नहीं बोलते। उपेक्षित किन्तु जन-जन में लोकप्रिय भाषा अवधी में रामचरित मानस की रचना की।

इस उपेक्षा काल में लोक संपदा में अवश्य दिव्य रचनाएं रही होंगी जिसे उपेक्षा के डिटर्जेंट ने मैल समझ कर धो डाला। संयोग से वाचिक परम्परा काल में रचनाओं को याद कर सुनाने की परिपाटी प्रचलित थी इसलिए अनेक लोगों ने इसे याद कर सुरक्षित रखा। आब्ध की तरह आजमगढ़ अंचल में भी लोकगीत कुछ प्रचलित पक्षों कजली, बिरहा, चौताल को कंठस्थ-धरोहर बना कर रक्खा। चौताल सम्राट द्विज छोटकुन के साथ अन्य चौतालकारों (सूर्यबली द्विवेदी, जगदीप तिवारी, इसारथ, मोती लाल) की रचनाएं बनारस के ठाकुर प्रसाद गुप्त के प्रकाशन से पहले व्यचिक ही थीं।

दयाराम का बिरहा बिलरियागंज के मूल निवासी और मुंबई में कार्यरत हरिहर प्रसाद गुप्त ने धर्मयुग में छपाया। उस्मान का सुग्गासनेस और बिसराम के बिरहों के उद्धारक डा. परमेश्वरी लालगुप्त, ईश्वरचन्द सिद्ध काशी तथा स्व. मुखराम सिंह थे। डा. भगवान देव यादव ने खोज करके अब्दुल रच्जाक, मिट्ठू धसियारा, ईद बिरहिया आदि के बिरहों को संकलित किया, लोक काव्य कला की कसौटी पर ये बिरहे अनुपम है। बलेस्सर ऐसे लोक गायक ने टिरी... टिरी... की अलौकिक टेरी ईजाद कर बिरहे को मौलिक से आधुनिक स्वरूप दिया और विदेशों में काशी, गोरखी की मिलीजुली आजमगढिय़ा भोजपुरी की मिठास बांटा।

आधुनिक काल में प्रकाशित आजमगढिय़ा भोजपुरी का दर्शन हमें ठेकमा शंभूपुर के धर्मोपदेशक पं. हरिहर प्रसाद शर्मा की रचनाओं में मिलता है जो रंगून में रहते थे। स्वाधीनता के बाद खूब कवि सम्मेलन हाते थे। उसमें स्व. हरीश उपाध्याय की भोजपुरी रचना तौहें जफर मारै हो परवारी, मोकदिमा में झुलनी बिकाय गई.... सराही जाती थी। ठेकमा बिलौजी के मूल निवासी स्व. राही मासूम रजा ने पान खांये सैया हमार भोजपुरी फिल्क में आजमगढिय़ा गालियों की बानगी प्रस्तुत की।

गाने में समर्थता के कारण 1955 में मुझे काव्य मंचों पर भोजपुरिया छाप तिलक के साथ धकेला गया किन्तु जन समर्थन में मुझे जिलाए रक्खा। आज मुंहफट, भालचंद त्रिपाठी, डा. ईश्वरचंद त्रिपाठी, डा. शालीग्राम थम्स्य नीर हजारी लाल गुप्त हमराज,  कन्हैयालाल प्रहरी जैसी भोजपुरिया करेंसी विख्यात हैं। अब भले पूर्वी अंचल को मऊ कहा जाता हो पर डा. कमलेश राय, दयाशंकर तिवारी, रमेश राय, ब्याकुल इसी आजमगढिय़ा भोजपुरी के रत्न हैं।
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