बीजेपी की चुनौती बढ़ाएगी आजमगढ़ की यह सीट, हुआ राजनीति में बड़ा उलटफेर    

प्रशासन द्वारा रैपिड सर्वे कराने के बाद शुरू हुई चर्चा

आजमगढ़. करीब डेढ़ दशक तक नगरपालिका की सत्‍ता से बाहर रहने वाली भाजपा ने पिछले चुनाव में पिछड़े पर दाव लगाकर सत्‍ता हथियाने में सफलता प्राप्‍त की थी। ऐसे में यह माना जा रहा है कि यूपी में भाजपा के सत्‍ता में आने के बाद आजमगढ़ नगरपालिका सीट को पहली बार पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित किया जा सकता है। हाल में प्रशासन द्वारा कराये जा रहे रैपिड सर्वे के बाद इसकी चर्चा जोरशोर से शुरू हो गयी है। अगर ऐसा होता है तो डेढ़ दर्जन से अधिक सवर्णों की दावेदारी धरी की धरी रह जायेगी।





बता दें कि आजमगढ़ हमेंशा से यूपी की सत्‍ता का केंद्र रहा है। पिछले दो दशक से इस जिले की पहचान सपा और बसपा के गढ़ के रूप में की जाती रही है। लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव हमेशा इनका पलड़ा भारी रहा है। अभी हाल में हुए विधानसभा चुनाव में सपा ने पांच और बसपा ने चार सीट हांसिल की। जबकि भाजपा को मात्र एक सीट पर संतोष करना पड़ा। वर्ष 1996 के बाद भाजपा यहां पहली बार विधानसभा चुनाव जीती है, लेकिन जब नगर निकाय चुनाव की बात आती है तो यह दल हमेंशा सपा और बसपा को कड़ी टक्‍कर देता रहा है।





वर्तमान में आजमगढ़ से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं और उनकी पार्टी ने आजमगढ़ नगरपालिका अध्‍यक्ष पद का चुनाव अब तक कभी नहीं जीत सकी है। इस बार यह सीट मुलायम सिंह यादव और उनके पुत्र पूर्व मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। वहीं वर्तमान में इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का कब्‍जा है। पार्टी की नेता इंदिरा जायसवाल नगर पालिका अध्‍यक्ष हैं।



 
करीब डेढ़ दशक पूर्व बीजेपी से माला द्विवेदी यह सीट जीती थी। इसके बाद से यहां गिरीश चंद् श्रीवास्‍तव का कब्‍जा था जो निर्दल चुनाव लड़कर जीतते रहे। गिरीश के निधन के बाद उनकी पत्‍नी शीला श्रीवास्‍तव अध्‍यक्ष चुनी गई। यह अलग बात है कि बाद में उन्‍होंने बसपा का दामन थाम लिया। गौर करें तो यहां की जनता डेढ़ दशक तक राजनीतिक दलों को नकारती रही।





वहीं सपा पिछले तीन चुनाव से लगातार अल्‍पसंख्‍यक प्रत्‍याशी पर दाव खेनने के बाद भी यहां खाता नहीं खोल सकी है। अब सपा सत्‍ता में नहीं है। भाजपा नगरपालिका की कुर्सी के साथ ही यूपी की सत्‍ता में भी काबिज है। नगरपालिका चुनाव की तैयारियां जोरशोर से चल रही है। अब तक जितने भी दावेदार सामने आये है एक इंदिरा को छोड़ दें तो सभी सवर्ण हैं। चुनाव में अपनी दावेदारी पक्‍की करने तथा जनता के बीच पैठ बनाने के लिए संभावति दावेदार पूरी ताकत झोंक रहे हैं।


इन सब के बीच जिला प्रशासन ने हाल ही में रैपिड सर्वें शुरू किया है। इस सर्वे के शुरू होने के बाद यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्‍या यह सीट पी‍छड़ी जाति के लिए आरक्षित की जायेगी। कारण कि शहर में पिछड़ी जातियों की संख्‍या काफी अधिक है। यदि ऐसा हुआ तो यह सीट न केवल पहली बार पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित होगी बल्कि इन दावेदारों का चुनाव लड़ने का सपना भी टूट जाएगा।
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