भाजपा के लिए अब तक अबुझ पहेली है जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी, कभी नहीं मिली जीत

भाजपा जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव भले ही जीतने का दावा कर रही हो लेकिन यह कुर्सी पार्टी के लिए अब तक अबुझ पहेली साबित हुई है। अब तक जितने भी चुनाव हुए है सीधी लड़ाई सपा और बसपा के बीच देखने को मिली है। पिछले 25 सालों से दोनों दल इस सीट पर कब्जा जमाए हुए है।

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी हथियाने के लिए रस्साकशी शुरू हो चुकी है। सपा और भाजपा ने अपने पत्ते खोल दिये है। भाजपा ने गृहमंत्री अमित शाह के करीबी कन्हैया निषाद को मैदान में उतारा तो सपा ने बाहुबली दुर्गा प्रसाद यादव के पुत्र पर दाव लगाया है। कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि चुनाव लड़े। रहा सवाल बसपा का तो पहली बार वह इस चुनाव में साइलेंट मूड में दिख रही है जो प्रत्याशियों की परेशानी बढ़ा रही है। कारण कि पार्टी के पास 14 सदस्य है। खास बात है कि जिला पंचायत अध्यक्ष की कुुर्सी हमेशा से बीजेपी के लिए अबुझ पहेली रही है। यूपी की सत्ता में रहते हुए भी पार्टी इस सीट पर कब्जा नहीं कर सकी है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार पार्टी इस अबुुझ पहेली को सुलझा पाएगी अथवा परिणाम पहले जैसा ही होगा।

बता दें कि आजमगढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर लंबे समय तक कांग्रेस का कब्जा रहा। यूपी में जैसे ही कांग्रेस हासिए पर आई और सपा-बसपा का उदय हुआ दोनों पाटिर्यों ने इस कुर्सी पर मजबूत पकड़ बनायी। सपा की ताकत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि एक बार पार्टी ने एक नर्तकी कामेश्वरी बाई को जिला पंचायत अध्यक्ष बना दिया था। उस समय भाजपा के विक्रम बहादुर सिंह को उपाध्यक्ष बनाया गया था। अध्यक्ष बनने के कुछ दिन बाद ही कामेश्वरी बाई का निधन हो गया। इसके बाद विक्रम बहादुर सिंह को अध्यक्ष का चार्ज दिया गया था। इसके अलावा कभी बीजेपी के किसी नेता को इस सीट पर बैठने का अवसर नहीं मिला।

पिछले पांच चुनावों की बात करें तो सपा के सपा तीन बार व बसपा दो बार अपना अध्यक्ष बनाने में सफल रही है। बसपा की तरफ से दो बार मीरा आजाद अध्यक्ष रहीं। वहीं सपा की तरफ से एक बार हवलदार यादव व पिछले दो बार से लगातार उनकी बहू मीरा यादव अध्यक्ष चुनी गयी। हमेंशा नंबर एक और दो की लड़ाई इन्हीं दलों के बीच देखने को मिली है। यह पहला चुनाव है जब बसपा की तरफ से उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई है। पार्टी चुनाव लड़ेगी या किसी का समर्थन करेगी इस मुद्दे पर कोई पदाधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं है।

ऐसे में अभी सीधा मुकाबला भाजपा और सपा में दिख रहा है लेकिन सदस्यों के समर्थन के मामले में सपा भाजपा से आगे है। सपा के 25 सदस्य है जबकि वर्तमान में बीजेपी के पास 24 सदस्य हैं। बहुमत के लिए 43 सदस्यों के समर्थन की जरूरत है। यानि सपा बहुमत से 18 व भाजपा 19 कदम दूर है। माना जा रहा है कि अपना दल का एक सदस्य भाजपा के साथ जा सकता है लेकिन भासपा के एक व कांग्रेस के एक सदस्य पर सपा का दावा मजबूत है। ऐसे में यह कहना आसान नहीं है कि जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा। दोनों ही दल अपनी जीत का दावा कर रहे हैं।

BY Ran vijay singh

रफतउद्दीन फरीद
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